priyavrata

 

Descending process of consciousness through the dynasty of Priyavrata

-         Radha Gupta

A higher mind has two tendencies. First, it ascends and then descends. Ascend makes the mind pure and stable and this purity and stability reflects the Self which is called Self – realization. In this realization, a person knows his own wealth of peace, power, purity, happiness, love, knowledge and bliss.

          But the story reveals a great truth that this knowing is not sufficient. For the strong feeling of his own wealth, it is compulsory to share this wealth amongst all or in all relations. A number of laws exist in nature. Here the law of attraction works. According to this law, the knd of energy a person delivers, the same kind of energy he gets in return. If a person gives love, he gets back love. Therefore, to feel peace – power – purity – love – happiness – knowledge or bbliss in life it is necessary to share the same. This sharing is called descend and this descend makes the spiritual journey complete.

          The story describes that this descend is also a process symbolized as the dynasty of king Priyavrata.

          The story points out three steps of this descend. First, the mind fills with the thoughts and feelings of peace – power – purity – happiness – love –knowledge and bliss. This is the first step symbolized as king Priyavrata.

          Secondly, the pure mind full of above feelings wishes to manifest and when it manifests, he enjoys it with great surprise. This is the second step symbolized as king Aagneedhra.

          Third, joined with the soul, it also joins with the supreme Soul for the continuous flow of peace, power, purity, love or bliss etc. as supreme Soul is the original source of all above qualities. This is the third step symbolized as king Nabhi.

          With the help of these three steps, a special consciousness descends in one’s personality symbolized as Rishabha. This consciousness is free from all bondages of nature and as a result all the functions of this consciousness are of great value.

          The story says that Bharata is a special feature of this consciousness. Bharata Symbolizes a mind sharing peace – power – purity – happiness – love – knowledge and bliss in all relations or with everyone in this universe. It’s sharing is unconditional and this is the only purpose of life.

 

प्रियव्रत वंश वर्णन के माध्यम से चैतन्य की अवरोहण स्थिति का चित्रण

-         राधा गुप्ता

 

श्रीमद्भागवत महापुराण के पञ्चम स्कन्ध में प्रथम अध्याय से लेकर सप्तम अध्याय तक राजा प्रियव्रत के वंश की कथा विस्तार से वर्णित है । कथा इस महत्त्वपूर्ण तथ्य को इंगित करती है कि आत्मस्वरूप को पहचान लेने के बाद भी आत्मा के सुख, शान्ति, शुद्धता, शक्ति, ज्ञान, प्रेम तथा आनन्द गुणों का गहनता से अनुभव करने के लिए उन गुणों को जगत में बांटना आवश्यक है । चैतन्य की आरोहण तथा अवरोहण नामक दो स्थितियों में से यही अवरोहण स्थिति है जिसका चित्रण प्रस्तुत कथा में अद्भुत ढंग से किया गया है । कथा का संक्षिप्त स्वरूप इस प्रकार है –

 

कथा का संक्षिप्त स्वरूप

     स्वायम्भुव मनु के दो पुत्र थे – उत्तानपाद और प्रियव्रत । नारद जी के उपासक प्रियव्रत परमार्थ तत्त्व के बोध से युक्त थे । अतः पृथ्वीपालन के लिए आवश्यक सभी गुणों से समन्वित देखकर स्वायम्भुव मनु ने अन्हें राज्य – शासन के लिए आज्ञा दी । परन्तु प्रियव्रत ने आत्म साधना में बाधक समझकर पिता की आज्ञा को स्वीकार नहीं किया । प्रियव्रत की ऐसी प्रवृत्ति को देखकर स्वयम्भू ब्रह्मा अपने लोक से उतरे और वहां उपस्थित नारद जी, स्वायम्भुव मनु तथा प्रियव्रत द्वारा सत्कृत होकर उन्होंने प्रियव्रत को ईश्वरीय विधान समझाकर पृथ्वी पालन के लिए आज्ञा दी । परम भागवत प्रियव्रत ने ब्रह्मा जी की आज्ञा को शिरोधार्य किया और पिता को भी प्रसन्न करते हुए वे पृथ्वी का शासन करने लगे ।

     प्रियव्रत ने प्रजापति विश्वकर्मा की पुत्री बर्हिष्मती से विवाह किया जिससे उनको आग्नीध्र प्रभृति दस पुत्र और ऊर्जस्वती नाम की एक कन्या प्राप्त हुई ।

     एक बार प्रियव्रत ने यह देखकर कि सूर्य एक बार में पृथ्वी के केवल आधे भाग को ही प्रकाशित करते हैं और शेष आधा भाग अन्धकार में रहता है – उसे पसन्द नहीं किया और स्वयं एक ज्योतिर्मय रथ पर आरूढ होकर पृथ्वी की सात परिक्रमाएं कर डाली । उनके रथ के पहिये से पृथ्वी में जो सात लीकें बनी, उससे पृथ्वी में सात द्वीप और सात समुद्र बन गए । ये सात द्वीप हैं – जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौञ्च, शाक और पुष्कर जो क्रमशः क्षार, इक्षुरस, मदिरा, घी, दूध, दधि और मीठे जल के सात समुद्रों से घिरे हैं ।

     प्रियव्रत ने ग्यारह अर्बुद वर्षों तक पृथ्वी का शासन किया और फिर अपने आग्नीध्र प्रभृति पुत्रों को उपरोक्त द्वीपों का स्वामी बनाकर वे तपस्या में संलग्न हो गए ।

     पिता के तपस्या में संलग्न हो जाने पर राजा आग्नीध्र जम्बू द्वीप की प्रजा का पुत्रवत् पालन करने लगे । एक बार वे सत्पुत्र  प्राप्ति के लिए मन्दराचल की घाटी में गए और ब्रह्मा जी की आराधना करने लगे । ब्रह्मा जी ने उनकी अभिलाषा जानकर अपनी सभा की गायिका पूर्वचित्ति नाम की अप्सरा को उनके पास भेजा जो आग्नीध्र के आश्रम के पास विचरने लगी । अप्सरा के चरण – नूपुरों की ध्वनि सुनकर आग्नीध्र ने समाधि योग से मुंदे हुए अपने नेत्रों को खोला और इसी रास्ते कामदेव ने उनके हृदय में प्रवेश कर लिया । आग्नीध्र ने अप्सरा पर मुग्ध होकर उसके गर्भ से नाभि प्रभृति नौ पुत्रों को उत्पन्न किया ।

     नाभि का विवाह मेरुदेवी से हुआ परन्तु नाभि को कोई सन्तान नहीं थी । सन्तान प्राप्ति हेतु उन्होंने अपनी भार्या मेरुदेवी के साथ ऋत्विजों की सहायता से भगवान् यज्ञपुरुष का यजन किया । भगवान् प्रकट हुए जिससे ऋत्विज, सदस्य और यजमान अत्यन्त आह्लादित हुए और भगवान् की स्तुति करने लगे । ऋत्विजों ने भगवान् से राजर्षि नाभि के लिए पुत्र प्राप्ति का वरदान मांगा । भगवान् अपनी अंशकला से अवतरित होने का वरदान देकर अन्तर्धान हो गए और तदनुरूप मेरुदेवी के गर्भ से भगवान् ऋषभ प्रकट हुए । जब नाभि ने देखा कि मन्त्रिमण्डल, नागरिक और राष्ट्र की जनता ऋषभदेव से बहुत स्नेह रखती है, तब वे ऋषभ को राज्याभिषिक्त करके मेरुदेवी के साथ बदरिकाश्रम को चले गए ।

     भगवान् ऋषभ दिगम्बर, संन्यासी, ऊर्ध्वरेता, आत्मिक आनन्द से युक्त और परमात्म स्वरूप में स्थित थे । एक बार इन्द्र ने ईर्ष्यावश उनके राज्य में वर्षा नहीं की । तब भगवान् ऋषभ ने इन्द्र की मूर्खता पर हंसते हुए अपनी योगमाया से अजनाभखण्ड में खूब जल बरसाया । ऋषभ ने इन्द्र – कन्या जयन्ती से विवाह किया और अपने समान गुण वाले सौ पुत्र उत्पन्न किए । उनके सभी पुत्र सुसमाहित चित्त से युक्त थे और भरत उनमें सबसे बडे थे । ऋषभ ने पृथ्वी का पालन करने के लिए भरत को राजगद्दी पर बैठाया और शेष पुत्रों को भरत का ही अनुसरण करने का उपदेश दिया । ऋषभ ने स्वयं जड, अन्ध, मूक, बधिर तथा उन्मत्त के समान विचरते हुए अवधूत धर्म ग्रहण कर लिया, अनेक योगचर्याओं का आचरण किया, गौ, काक, मृग तथा अजगर आदि अनेक वृत्तियों को स्वीकार किया तथा स्वयं उपस्थित हुई सिद्धियों को भी ग्रहण नहीं किया ।

     ऋषभ – पुत्र भरत ने पिता की आज्ञानुसार पृथ्वी की रक्षा का भार ग्रहण करके विश्वरूप की कन्या पञ्चजनी से विवाह किया जिससे उनके सुमति, राष्ट्रभृत्, सुदर्शन, आवरण और धूम्रकेतु नामक पांच पुत्र हुए । राजा भरत के समय से ही अजनाभवर्ष को भारतवर्ष कहा जाने लगा ।

कथा की प्रतीकात्मकता

प्रस्तुत कथा पूर्णरूपेण प्रतीकात्मक है । एक – एक प्रतीक को समझकर ही कथा को समझा जा सकता है । अतः सर्वप्रथम कथा के सभी प्रतीकों को समझने का प्रयास करें –

१. स्वायम्भुव मनु – मनुष्य का मन जब देह और देह के भोगों से बंधा रहता है, तब निम्न कहलाता है और इस निम्न मन की स्थिति में चेतना के विकास की सम्भावनाएं नगण्य ही रहती हैं । परन्तु यही मन जब देह और देह के भोगों से ऊपर उठ जाता है, तब उच्च कहलाता है और यहीं से मनुष्य चेतना का विकास प्रारम्भ होता है । पौराणिक साहित्य में इस उच्च मन को ही स्वायम्भुव मनु कहा गया है । मनु का अर्थ है – मन और इस मन का निम्न से उच्च हो जाना स्वयम्भू ब्रह्मा अर्थात् बृंहणशील मन का एक विशिष्ट गुण है जिसे कथा में स्वयम्भू ब्रह्मा का स्वायम्भुव मनु नामक पुत्र कहकर इंगित किया गया है ।

२. प्रियव्रत – इस उच्च मन अर्थात् स्वायम्भुव मनु के भी दो गुण(पुत्र) हैं । एक है – आरोहण अर्थात् ऊर्ध्वविकास जिसे उत्तानपाद नामक पुत्र कहा गया है तथा दूसरा है – अवरोहण अर्थात् क्षैतिज विकास जिसे प्रियव्रत नामक पुत्र कहकर इंगित किया गया है । प्रियव्रत का अर्थ है – प्रिय – व्रत अर्थात् प्रिय नियम । देहभाव से ऊपर उठकर आत्मा में स्थित हुए मन का आत्मा के सुख, शान्ति, शक्ति, शुद्धता, ज्ञान, प्रेम तथा आनन्द प्रभृति गुणों से आप्लावित हो जाना एक प्रिय नियम है अर्थात् आरोहण प्रक्रिया के द्वारा मन जैसे ही आत्मस्थ होता है, वैसे ही वह आत्मस्थ मन आत्मा के सुख, शान्ति, शुद्धता, प्रेम तथा आनन्द प्रभृति गुणों से सहज रूप से ओतप्रोत हो जाता है जो अवरोहण प्रक्रिया का पहला चरण है । इस तथ्य को ही कथा में यह कहकर इंगित किया गया है कि राजा प्रियव्रत ने एक ज्योतिर्मय रथ पर आरूढ होकर पृथ्वी की सात परिक्रमाएं की और उनके रथ के पहिये से जो सात लीकें बनी, वे ही पृथ्वी में सात समुद्र तथा सात द्वीप बन गए ।

३. सात द्वीप और सात समुद्र – ऐसा प्रतीत होता है कि आत्मस्थ होने पर मन रूपी पृथ्वी जिन सात संकल्पों तथा तदनुरूप सात भावों से आप्लावित हो जाती है – इन्हें ही यहां सात द्वीप और सात समुद्र कहा गया है ।

I- मैं आत्मा आनन्दस्वरूप हूं – इस संकल्प को जम्बूद्वीप तथा तदनुगत आनन्द भाव  को मीठे जल का समुद्र कहा जा सकता है । चूंकि आनन्द भाव में सुख – शान्ति प्रभृति सभी भावों का अन्तर्भाव भी होता है, इसलिए आत्मा को केवल आनन्दस्वरूप भी कहा जाता है ।

II- मैं आत्मा शुद्धस्वरूप हूं – इस संकल्प को प्लक्षद्वीप तथा तदनुगत शुद्धता के भाव को क्षार समुद्र कहा जा सकता है । प्लक्ष शब्द प्रक्ष् धातु का तद्भव रूप प्रतीत होता है, जिसका अर्थ है – प्रक्षालन करना, शुद्ध करना । 

III- मैं आत्मा सुखस्वरूप हूं – इस संकल्प को शाल्मलि द्वीप तथा तदनुगत सुख के भाव को इक्षुरस का समुद्र कहा जा सकता है । शाल्मलि शब्द शर्मन् से बना प्रतीत होता है जिसका अर्थ है – खुशी, प्रसन्नता ।

IV- मैं आत्मा शान्तस्वरूप हूं – इस संकल्प को कुशद्वीप तथा तदनुगत शान्ति के भाव को मदिरा का समुद्र कहा जा सकता है । कुश(कु – श) का अर्थ है – ध्वनि का शमन अर्थात् शान्ति ।

V- मैं आत्मा ज्ञानस्वरूप हूं – इस संकल्प को क्रौञ्चद्वीप तथा तदनुगत ज्ञानभाव को घृत का समुद्र कहा जा सकता है । क्रौञ्च शब्द कुच् धातु से बना प्रतीत होता है जिसका अर्थ है – चमकाना । ज्ञान भी जीवन को चमकाता अर्थात् प्रकाशित करता है ।

VI- मैं आत्मा शक्तिस्वरूप हूं – इस संकल्प को शाकद्वीप तथा तदनुगत शक्ति के भाव को दुग्ध का समुद्र कहा जा सकता है । शाक शब्द का अर्थ है – शक्ति, सामर्थ्य ।

VII -मैं आत्मा प्रेमस्वरूप हूं – इस संकल्प को पुष्कर द्वीप तथा तदनुगत प्रेमभाव को मट्ठे का समुद्र कहा जा सकता है । पुष्कर (पुष्कं पुष्टिं राति) शब्द का अर्थ है – पुष्टि प्रदान करना । प्रेम मानसिक, सामाजिक तथा शारीरिक सभी स्तरों पर पुष्टि प्रदान करता है ।

४. बर्हिष्मती – कथा में बर्हिष्मती को प्रियव्रत की पत्नी कहकर सम्बोधित किया गया है । बर्हिष्मती शब्द में बर्हि शब्द बृह् धातु से बना है जिसका अर्थ है – वर्धन करना । मती प्रत्यय से युक्त होने पर बर्हिष्मती का अर्थ हुआ – वर्धनयुक्त । मन जब अवरोहण करता है, तब मनश्चेतना भी वर्धनयुक्त होती है और इस वर्धनयुक्त मनश्चेतना के सहयोग से ही अवरोहण यात्रा का प्रारम्भ सम्भव हो पाता है ।

५. आग्नीध्र – आग्नीध्र शब्द अग्नि शब्द में इन्ध धातु के योग से बना प्रतीत होता है जिसका अर्थ है – अग्नि(चेतना) का दीपन अर्थात् ऐसा मन जिसकी अग्नि(चेतना) दीप्त हो गई हो । श्री विपिन कुमार ने वैदिक संदर्भों के आधार पर कहा है आग्नीध्र के पास ओंकार का बल है । वह सारी पृथ्वी को ओंकार की कला से अभिभूत कर देना चाहता है । वह आकाश और पृथ्वी के बीच अन्तरिक्ष में स्थित है, इसलिए बहिर्मुखी भी हो सकता है और अन्तर्मुखी भी ।(द्रष्टव्य – पुराण विषय अनुक्रमणिका में आग्नीध्र शब्द पर टिप्पणी ) । इस आधार पर कहा जा सकता है कि जब मन एक ओर तो आनन्दस्वरूप आत्मा से जुडा रहता है और दूसरी ओर उस आनन्द को जीवन में अभिव्यक्त भी करने लगता है, तब आग्नीध्र कहलाता है ।

        तात्पर्य यह है कि प्रियव्रत स्थिति में जहां मन सुख – शान्ति – शुद्धता – प्रेम तथा आनन्द प्रभृति आत्मगुणों के संकल्पों और भावों से आप्लावित रहता है, वहीं आग्नीध्र स्थिति में वे सब भाव अथवा उन भावों का एकत्वरूप आनन्द जीवन में अभिव्यक्त भी होने लगता है । इसलिए प्रियव्रत स्थिति को अवरोहण यात्रा का पहला चरण तथा आग्नीध्र स्थिति को दूसरा चरण कहा जा सकता है । परन्तु चूंकि आग्नीध्र स्थिति प्रियव्रत स्थिति के बाद ही घटित हो सकती है, इसलिए कथा में आग्नीध्र को प्रियव्रत का पुत्र कहना युक्तसंगत ही है ।

६. पूर्वचित्ति अप्सरा – पूर्वचित्ति शब्द में पूर्व का अर्थ है – पहले से ही विद्यमान तथा चिति का अर्थ है – संग्रह या परत । अतः पूर्वचिति(पूर्व – चित्ति) का अर्थ है – पहले से ही विद्यमान आत्म-भावों या आत्म – गुणों का संग्रह । अप्सरा(अप् – सरा) का अर्थ है – उन आत्म-भावों को अभिव्यक्त करने वाली शक्ति या प्रवृत्ति । अथवा ऐसा भी कह सकते हैं कि जो शक्ति आनन्दमय कोष में विद्यमान आनन्द आदि आत्म-भावों को मनोमयादि निचले कोषों में अभिव्यक्त करती है, वह पूर्वचित्ति अप्सरा है ।

        आग्नीध्र स्थिति में आत्मा के सुख- शान्ति – शुद्धता आदि भाव जीवन में अभिव्यक्त होने लगते हैं और शुद्ध मन उस अभिव्यक्ति पर अत्यन्त मुग्ध होता है जिसे कथा में पूर्वचित्ति अप्सरा पर आग्नीध्र की आसक्ति कहकर इंगित किया गया है ।

       कथा में कहा गया है कि आग्नीध्र ने मन्दराचल की घाटी में बैठकर जब ब्रह्मा जी की आराधना की, तब पूर्वचित्ति अप्सरा प्रकट हुई । मन्दराचल का अर्थ है – मम – दृ – अचल अर्थात् मैं – मेरे के संकल्प को विदीर्ण करके स्थिर हो जाना और आग्नीध्र का अर्थ है – आत्मस्थ शुद्ध श्रेष्ठ मन । ब्रह्मा जी की आराधना का अर्थ है – सृष्टिकर्त्ता की शक्ति के नियम का क्रियान्वयन । कथन का तात्पर्य यह है कि मन के अत्यन्त शुद्ध और स्थिर हो जाने पर सुख – शान्ति – शुद्धता – प्रेम – आनन्द प्रभृति आत्मगुणों का प्रकट होना सृष्टिकर्त्ता के नियमानुसार अत्यन्त स्वाभाविक और सहज ही है ।

७. नाभि – नाभि का अर्थ है – केन्द्र में अर्थात् परमात्मा के योग में स्थित मन । अवरोहण यात्रा का यह तीसरा चरण है । अवरोहण यात्रा के पहले चरण में अर्थात् प्रियव्रत स्थिति में मनुष्य का मन सुख – शान्ति प्रभृति आत्मगुणों के संकल्पों तथा भावों से आप्लावित रहता है । दूसरे चरण में अर्थात् आग्नीध्र स्थिति में उन भावों पर अथवा उन भावों के एकत्वस्वरूप आनन्दभाव पर मुग्ध रहता है । अब तीसरे चरण में उन आत्मगुणों का जगत में अथवा सम्बन्धों में फैलाव हो जाना चाहिए । परन्तु ऐसा नहीं होता । नाभि नामक पात्र के माध्यम से यह संकेत किया गया है कि आत्मगुणों को जगत में बांटने से पहले आत्मगुणों से ओतप्रोत मन का उन आत्मगुणों के मूलस्रोत परमात्मा से जुडना अनिवार्य है । तात्पर्य यह है कि आत्मा तो सुख – शान्ति आदि का स्वरूप ही है परन्तु परमात्मा इन सभी गुणों का सागर है और परमात्मा से जुडकर ही मनुष्य सुख – शान्ति – प्रेम – आनन्द आदि गुणों को जगत में निरन्तर बांट सकता है, ठीक उसी प्रकार जैसे किसी अदृश्य जलस्रोत से जुडे रहने पर ही कुआं निरन्तर जल प्रदान करता है ।

        कथा में कहा गया है कि पुत्र प्राप्ति हेतु नाभि ने ऋत्विजों के साथ यज्ञपुरुष का यजन किया जिससे वासुदेव के दर्शन एवं अनुग्रह के फलस्वरूप उन्हें ऋषभ नामक पुत्र प्राप्त हुआ ।

        नाभि अर्थात् परमात्मा के योग में स्थित मन की वृत्तियों ( व्यापारों) को ऋत्विज कहा जा सकता है ।

        यज्ञपुरुष के यजन का अर्थ है – इस प्रवाहमान सृष्टि रूपी यज्ञ को सर्वथा उचित एवं कल्याणकारी समझते हुए श्रद्धापूर्वक कर्म करना ।

         वासुदेव के दर्शन का अर्थ है – पालनकर्त्ता शक्ति के प्रति परम अनुग्रह के भाव से युक्त होना ।

        तथा ऋषभ की प्राप्ति का अर्थ है – श्रेष्ठ व्यक्तित्व का अवतरण ।

        तात्पर्य यह है कि नाभि स्थिति में रहकर उपर्युक्त प्रकार से व्यवहार करते हुए जो दृष्टि – परिवर्तन(change of perception ) घटित होता है, उससे एक श्रेष्ठ व्यक्तित्व अवतरित होता है जिसे कथा में ऋषभ कहा गया है । यहां इस महत्त्वपूर्ण तथ्य की ओर संकेत किया गया है कि अब मनुष्य सुख अथवा आनन्द की प्राप्ति के लिए कर्म नहीं करता, अपितु सुख में रहकर कर्म करता है (being में रहकर doing में जाना)  जिससे कर्म करना बोझ नहीं रहता और कर्म आनन्दपूर्ण हो जाता है ।

८. मेरुदेवी – मेरुदेवी को राजर्षि नाभि की पत्नी कहा गया है । मेरु का अर्थ है – वह परम सत्ता जहां जगत का प्रारम्भ भी है और अन्त भी । ठीक उसी प्रकार जैसे माला में एक दाना मेरु कहलाता है और माला का प्रारम्भ और अन्त इसी मेरु पर होता है । पौराणिक साहित्य में पत्नी सर्वत्र शक्ति का प्रतीक है । अतः  यहां भी पत्नी मेरुदेवी के माध्यम से नाभि नामक पात्र की परमात्मनिष्ठता को संकेतित किया गया है ।

९. ऋषभ – अवरोहण यात्रा में ऊपर वर्णित प्रियव्रत, आग्नीध्र और नाभि नामक तीनों चरणों को पार करके जो श्रेष्ठ चेतना अवतरित होती है, उसे कथा में भगवान् का ऋषभ नामक अवतार कहा गया है । ऋषभ शब्द का अर्थ ही है – श्रेष्ठ । यह ऋषभ चेतना शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक सभी दृष्टियों से विशिष्ट होती है जिसका संकेत कथा में ऋषभ चरित्र के विस्तृत वर्णन के माध्यम से प्राप्त होता है । संक्षेप में यह चेतना दिगम्बर अर्थात् मन – बुद्धि के ऊपर छाए हुए सभी आवरणों से रहित, संन्यासी अर्थात् सम्यक् प्रकार से आत्मस्वरूप में न्यस्त(स्थित), ऊर्ध्वरेता अर्थात् सदैव ऊर्ध्वमुखी चेतना से युक्त, अनासक्त अर्थात् सर्वथा आसक्ति से रहित, अतः साक्षीभाव में स्थित, आन्तरिक आनन्द से युक्त अर्थात् इन्द्रियात्मक भोगों से प्राप्त सुख – दुः ख से सर्वथा परे और परमात्मकेन्द्रित जीवन से सम्पन्न होती है जिसे कथा में अजनाभखण्ड में निवास करना कहा गया है ।

१०. ऋषभ का इन्द्र – कन्या जयन्ती से विवाह – इन्द्र – कन्या जयन्ती से विवाह का अर्थ है – मन की शासन एवं नियन्त्रण शक्ति (ruling and controlling power) से युक्त होना । इसीलिए ऋषभ चेतना से सम्पन्न मनुष्य के सभी संकल्प ज्ञान – विज्ञान से युक्त होते हैं जिन्हें ऋषभ – जयन्ती के सौ पुत्र कहकर इंगित किया गया है । उनमें सबसे बडा है – भरत । भरत अर्थात् सुख – शान्ति- शुद्धता – प्रेम – आनन्द रूप आत्मगुणों के उस भार को जगत में फैलाना अथवा बांटना जिस भार से वह स्वयं भर गया होता है । ऋषभ चेतना के शेष सभी संकल्प इसी भरत मन का अनुसरण करते हैं जिसे कथा में भगवान् ऋषभ द्वारा अपने सभी पुत्रों को सबसे बडे भाई भरत का अनुगमन करने की शिक्षा देने के रूप में इंगित किया गया है । 

११. भरत – अवरोहण यात्रा का अन्तिम और पांचवां चरण है – भरत । भरत शब्द का अभिप्राय है – भऱं – तनोति अर्थात् भार(संग्रह, समुच्चय) को फैलाने वाला, बांटने वाला, देने वाला अथवा विस्तारित करने वाला । आत्मा के सुख, शान्ति, शुद्धता, शक्ति, प्रेम, ज्ञान तथा आनन्द रूप सात गुणों के समुच्चय को ही यहां भार कहा गया है । अतः जो मन इन आत्मगुणों को जीवन में, जगत में अथवा सम्बन्धों में बांटता है, देता है – वह भरत है ।

१२. भरत का विश्वरूप की कन्या पञ्चजनी से विवाह –

पञ्चजनी को भरत की पत्नी कहा गया है । पञ्चजनी शब्द पञ्च तथा जनी नामक दो शब्दों के मेल से बना है । पञ्च का अर्थ है – पांच और जनी का अर्थ है – उत्पन्न करने वाली । पांच महाभूतों को उत्पन्न करने के कारण प्रकृति शक्ति को पंचजनी कहा जा सकता है । कथा में उसे विश्वरूप की कन्या भी कहा गया है । कन्या शब्द पौराणिक साहित्य में विशेषता का द्योतक है । एक ही परमसत्ता जब अनन्त नाम रूप धारण करती है, तब विश्वरूप हो जाती है और इस विश्वरूप की प्रधान विशेषता है – पंचभूतों को उत्पन्न करने वाली सतत् परिवर्तनशील प्रकृति अर्थात् विश्वरूप की सत्ता सतत् परिवर्तनशील प्रकृति के कारण ही सम्भव है । अतः यहां विश्वरूप की कन्या पंचजनी को भरत की पत्नी कहकर यह संकेतित करने का प्रयास किया गया है कि भरत मन सतत् परिवर्तनशील प्रकृति को अपनी शक्ति बना लेता है । वह जीवन में उपस्थित किसी भी परिवर्तन से विचलित नहीं होता प्रत्युत अनुकूल अथवा प्रतिकूल प्रत्येक परिवर्तन को स्वीकार करता है । तात्पर्य यह है कि सुख – शान्ति – प्रेम – आनन्द को बांटने में कोई भी स्थिति – परिस्थिति आडे नहीं आती । उदाहरण के लिए, सम्पर्क में आने वाला व्यक्ति कितना भी क्रोधी हो – भरत मन शान्ति ही बांटता है , व्यक्ति कितना भी घृणा से भरा हो, भरत मन प्रेम ही बांटता है, व्यक्ति कितना भी दुराचारी अथवा दुष्ट हो, भरत मन शुद्धता ही बांटता है तथा परिस्थिति कैसी भी विषम अथवा दुःखपूर्ण हो – भरत मन शक्ति और सुख की तरंगें ही प्रवाहित करता है ।

१३. भरत के पांच पुत्र – कथा में भरत और पञ्चजनी के पांच पुत्र बतलाए गए हैं। उनके नाम हैं – सुमति, सुदर्शन, राष्ट्रभृत, आवरण और धूम्रकेतु । सुमति(स्वमति) का अर्थ है – अपने अनुकूल । सुदर्शन का अर्थ है – देखने में श्रेष्ठ, सुन्दर । राष्ट्रभृत का अर्थ है – राष्ट्र अर्थात् व्यक्तित्व का भरण करने वाली । आवरण का अर्थ है – व्यक्तित्व को अथवा जीवन को ढंक देने वाली और धूम्रकेतु का अर्थ है – अत्यन्त अज्ञानपूर्ण । इन पांच पुत्रों के रूप में यहां परिवर्तनशील प्रकृति की पांच स्थितियों की ओर ही संकेत किया गया प्रतीत होता है ।

१४. प्रियव्रत का नारद – उपासक होना – कथा में प्रियव्रत को नारद जी का उपासक कहा गया है । पौराणिक साहित्य का नारद नामक पात्र प्रकृति में क्रियाशील आकर्षण के नियम( law of attraction) को इंगित करता है । इसका तात्पर्य यह है कि मनुष्य अपने विचारों के माध्यम से जैसी ऊर्जा प्रवाहित करता है, वैसी ही ऊर्जा अधिक प्रबल होकर उसके पास वापस लौटती है । अतः नारद – उपासक कहकर यह संकेत किया गया है कि प्रियव्रत नामक पात्र आध्यात्मिक साधना की आरोहण तथा अवरोहण नामक दो स्थितियों में से अवरोहण स्थिति का द्योतक है क्योंकि अवरोहण स्थिति का मूल भाव ही यह है कि आत्म – साक्षात्कार रूप आरोहण द्वारा मनुष्य में जिन सुख – शान्ति – प्रेम – आनन्द प्रभृति आत्मगुणों को प्राप्त किया है – उन्हीं आत्मगुणों को जगत में बांटना है, देना है । देने से उन आत्मगुणों की ऊर्जा अधिक प्रबल होकर देने वाले को पुनः प्राप्त हो जाती है ।

१५. कथा के प्रारम्भ में कहा गया है कि प्रियव्रत ने स्वायम्भुव मनु की राज्यशासन की आज्ञा को तो स्वीकार नहीं किया परन्तु ब्रह्मा जी ने जब ईश्वरीय विधान को समझाकर उन्हें राज्यशासन के लिए प्रेरित किया, तब प्रियव्रत ने उसे स्वीकार कर लिया ।

       इस कथन द्वारा अवरोहण की अनिवार्यता की ओर संकेत किया गया है । आरोहण अर्थात् आत्मस्थ होने से मनुष्य को जिस सुख – शान्ति की प्राप्ति होती है, उसकी अनुभूति इतनी अच्छी होती है कि मनुष्य – मन उसी में रमना चाहता है परन्तु यह आध्यात्मिक साधना की पूर्णता नहीं है । यह यात्रा का केवल आधा भाग है । शेष आधा भाग अवरोहण अर्थात् आत्मगुणों को जगत में, सम्बन्धों में बांटने पर ही सम्पन्न होता है । यही ईश्वरीय विधान है और मानव जीवन का उद्देश्य भी यही है ।

 

प्रियव्रत की कथा का वैदिक स्वरूप

-         विपिन कुमार

भागवत की कथा में कहा गया है कि प्रियव्रत ने देखा कि सूर्य आधी पृथिवी को तो प्रकाशित करता है, आधी अन्धकार में ही रहती है। अतः राजा प्रियव्रत ने अपने रथ में बैठकर इस पृथिवी के ७ चक्कर लगाए। उसके रथ के पहियों से इस पृथिवी पर सात द्वीप बन गए जिनका राज्य उसने अपने ७ पुत्रों में बांट दिया। इस कथा का वैदिक मूल शतपथ ब्राह्मण १०.१.३.१ में खोजा जा सकता है। सुविधा के लिए, इस अंश को यहां यथावत् प्रस्तुत किया जा रहा है-

प्रजापतिः प्रजा असृजत। स ऊर्ध्वेभ्य एव प्राणेभ्यो देवानसृजत। येऽवाञ्चः प्राणास्तेभ्यो मर्त्याः प्रजाः। अथोर्ध्वमेव मृत्युं प्रजाभ्योऽत्तारमसृत। १।।

प्रजापति ने प्रजा का सृजन किया। उसने ऊर्ध्व प्राणों से देवों का सृजन किया। जो अधो प्राण हैं, उनसे मर्त्य प्रजा का सृजन किया। इसके पश्चात् प्रजा के भक्षक के रूप में मृत्यु का ऊर्ध्व ही सृजन किया।

तस्य ह प्रजापतेरर्धमेव मर्त्यमासीत्। अर्धममृतम्। तद्यदस्य मर्त्यमासीत्तेन मृत्योरबिभेत्। स बिभ्यदिमां प्राविशद् – द्वयं भूत्वा। मृच्चापश्च।।२।।

उस प्रजापति का आधा ही मर्त्य था। आधा अमृत था। अब जो उसका मर्त्य था, उसके कारण उसे मृत्यु से डर लगा। वह डर कर इस पृथिवी में प्रवेश कर गया – दो बनकर, मृदा और आपः।

स मृत्युर्देवानब्रवीत् – क्व नु सोऽभूत् – यो नोऽसृष्टेति। त्वद्बिभ्यदिमां प्राविशदिति। सोऽब्रवीत्। तं वाऽअन्विच्छाम। तं सम्भराम। न वाऽअहं तं हिंसिष्यामीति। तं देवा अस्या अधि समभरन्। यदस्याप्स्वासीत्, ताः – अपः समभरन्। अथ यदस्यां – तां मृदम्। तदुभयं सम्भृत्य मृदं चापेश्चेष्टकामकुर्वन्। तस्मादेतदुभयमिष्टका भवति। मृच्चापश्च।।३।।

उस मृत्यु ने देवों से कहा – उसका क्या हुआ जिसने हमारा सृजन किया था। देवों ने कहा वह तुमसे डर कर इस पृथिवी में प्रवेश कर गया है। मृत्यु ने कहा – हमें उसे ढूंढना चाहिए। उसको एकत्रित करना चाहिए। मैं उसकी हिंसा नहीं करूंगी। उस प्रजापति को देवों ने इस पृथिवी में से एकत्र किया। जो इस प्रजापति का भाग आपः में था, उस आपः को एकत्र किया। और जो इसका भाग पृथिवी में था, उस मृदा को एकत्र किया। इन दोनों को एकत्र करके मृदा व आपः से इष्टकाएं बनाईं। इसी कारण से इष्टका को बनाने में दो द्रव्यों का प्रयोग किया जाता है – मृदा व आपः।

तदेता वा अस्य ताः पञ्च मर्त्यास्तन्व आसन् – लोम, त्वक्, मांसम्, अस्थि, मज्जा। अथैता अमृताः – मनः, वाक्, प्राणः, चक्षुः, श्रोत्रम्।।४।।

उस प्रजापति के यह पांच मर्त्य तनु थे – लोम, त्वक्, मांस, अस्थि व मज्जा। और यह अमृत थे – मन, वाक्, प्राण, चक्षु, श्रोत्र।

स यः स प्रजापतिः। अयमेव स योऽयमग्निश्चीयते। अथ या अस्य ताः पञ्च मर्त्यास्तन्व आसन् – एतास्ताः पुरीषचितयः। अथ या अमृताः – एतास्ता इष्टकाचितयः।।५।।

जो वह प्रजापति है। वह यही है जो यह अग्नि का चयन किया जाता है। और जो इसके पांच मर्त्य तनू थे, वह यह पांच पुरीषचितियां हैं। और जो अमृत तनू थे, वह यह इष्टका चितियां हैं ।

ते देवा अब्रुवन् – अमृतमिमं करवामेति। तस्यैताभ्याममृताभ्यां तनूभ्यामेतां मर्त्यां तनूं परिगृह्यामृतामकुर्वन्। इष्टकाचितिभ्यां पुरीषचितिम्। तथा द्वितीयम्। तथा तृतीयम्। तथा चतुर्थीम्।।६।।

उन देवों ने कहा – इसे अमृत करना चाहिए। उसके अमृत तनुओं से इस मर्त्य तनु का परिग्रहण करके अमृत किया। इष्टकाचितियों से पुरीषचिति को। इसी प्रकार द्वितीय चिति को। इसी प्रकार तृतीय चिति को। इसी प्रकार चतुर्थी चिति को।

अथ पञ्चमीं चितिमुपधाय पुरीषं निवपति। तत्र विकर्णीं च स्वयमातृण्णां चोपदधाति। हिरण्यशकलैः प्रोक्षति, अग्निमभ्यादधाति। सा सप्तमी चितिः। तदमृतम्। एवमस्यैताभ्याममृताभ्यां तनूभ्यामेतां मर्त्यां तनूं परिगृह्यामृतामकुर्वन् – इष्टकाचितिभ्यां पुरीषचितिम्। ततो वै प्रजापतिरमृतोऽभवत्। तथैवैतद्यजमान एतममृतमात्मानं कृत्वा सोऽमृतो भवति।।७।।

अब पंचमी चिति को रखकर पुरीष निवपन करते हैं। वहां विकर्णी तथा स्वयमातृण्णा इष्टकाओं को रखते हैं। हिरण्यशकलों से प्रोक्षण करते हैं, अग्नि का आधान करते हैं। यह सप्तमी चिति होती है। यह अमृत होती है। इस प्रकार अमृत तनुओं से इस मर्त्य तनू का परिग्रहण करके अमृत करते हैं – इष्टकाचितियों द्वारा पुरीषचिति को। तभी प्रजापति अमृत हुआ। इसी प्रकार यजमान स्वयं को अमृत करके अमृत होता है।

स प्रथमां चितिं चिनोति – सा हास्यैषा प्राण एव। तद्वै तदमृतम्। अमृतं हि प्राणः। सैषा ऽमृतचितिः। अथ पुरीषं निवपति – तद्धास्यैतन्मज्जैव। तद्वै तन्मर्त्यम्। मर्त्यो हि मज्जा। तदेतस्मिन्नमृते प्रतिष्ठापयति। तेनास्यैतदमृतं भवति।।१०.१.४.२।।

वह प्रथम चिति का चयन करता है – वह इसका प्राण ही है। प्राण ही अमृत है। यह अमृतचिति है। अब पुरीष का निवपन करता है – यह उसकी मज्जा ही है। यह तो मर्त्य है। मज्जा मर्त्य ही है। इसको अमृत में प्रतिष्ठापित करता है। इससे यह अमृत बन जाती है।

द्वितीयां चितिं चिनोति- सा हास्यैषाऽपान एव। तद्वै तदमृतम्। अमृतं ह्यपानः। सैषाऽमृत चितिः। तदेतन्मर्त्यमुभयतोऽमृतेन परिगृह्णाति। तेनास्यैतदमृतं भवति। अथ पुरीषं निवपति – तद्धास्यैतदस्थ्येव। तद्वै तन्मर्त्यं । मर्त्यं ह्यस्थि। तदेतस्मिन्नमृते प्रतिष्ठापयति। तेनास्यैतदमृतं भवति।।३।।

द्वितीय चिति का चयन करता है – यह इसका अपान ही है। वह अमृत ही है। अमृत ही
अपान है। यह अमृत चिति है। इस मर्त्य का दोनों ओर से अमृत द्वारा परिग्रहण करता है। इससे यह अमृत हो जाती है। अब पुरीष का निवपन करता है – यह इसकी अस्थि ही है। यह मर्त्य ही है। मर्त्य ही अस्थि है। इसे इस अमृत में प्रतिष्ठापित करता है। इससे यह अमृत हो जाती है।

तृतीयां चितिं चिनोति – सा हास्यैषा व्यान एव। तद्वै तदमृतम्। अमृतं हि व्यानः। सैषाऽमृतचितिः। तदेतन्मर्त्यमुभयतोऽमृतेन परिगृह्णाति – तेनास्यैतदमृतं भवति। अथ पुरीषं निवपति। तद्धास्यैतत्स्नावैव। तद्वै तन्मर्त्यम्। मर्त्यं हि स्नाव। तदेतस्मिन्नमृते प्रतिष्ठापयति। तेनास्यैतदमृतं भवति।।४।।

तृतीय चिति का चयन करता है – वह इसका व्यान ही है। वह अमृत ही है। अमृत ही व्यान है। यह अमृतचिति है। इस मर्त्य का दोनों ओर से अमृत द्वारा परिग्रहण करते हैं – इससे यह अमृत हो जाता है। अब पुरीष का निवपन करते हैं। यह इसका स्नायु ही है। वह मर्त्य ही है. मर्त्य ही स्नायु है। इसे इस अमृत में प्रतिष्ठापित करते हैं। इससे यह अमृत हो जाता है।

चतुर्थीं चितिं चिनोति – सा हास्यैषोदान एव। तद्वै तदमृतम्। अमृतं ह्युदानः। सैषाऽमृतचितिः। तदेतन्मर्त्यमुभयतोऽमृतेन परिगृह्णाति। तेनास्यैतदमृतं भवति। अथ पुरीषं निवपति। तद्धास्यैतन्मांसमेव। मर्त्यं हि मांसम्। तदेतस्मिन्नमृते प्रतिष्ठापयति। तेनास्यैतदमृतं भवति।।५।।

चतुर्थ चिति का चयन करता है – यह इसका उदान ही है। - - - - अब पुरीष निवपन करता है। यह इसका मांस ही है।  - - - -

पञ्चमीं चितिं चिनोति। सा हास्यैषा समान एव। तद्वै तदमृतम्। अमृतं हि समानः। सैषाऽअमृतचितिः। तदेन्मर्त्यमुभयतोऽमृतेन परिगृह्णाति। तेनास्यैतदमृतं भवति। अथ पुरीषं निवपति। तद्धास्यैतन्मेद एव। तद्वै तन्मर्त्यम्। मर्त्यं हि मेदः। तदेतस्मिन्नमृते प्रतिष्ठापयति। तेनास्यैतदमृतं भवति।।६।।

पञ्चम चिति का चयन करता है । यह इसका समान ही है। - - - - -अब पुरीष का निवपन करता है। यह इसका मेद ही है। - - - -

षष्ठीं चितिं चिनोति – सा हास्यैषा वागेव। तद्वै तदमृतम्। अमृतं हि वाक्। सैषाऽमृतचितिः। तदेतन्मर्त्यमुभयतोऽमृतेन परिगृह्णाति। तेनास्यैतदमृतं भवति। अथ पुरीषं निवपति – तद्धास्यैतदसृगेव, त्वगेव। तद्वै तन्मर्त्यम्। मर्त्यं ह्यसृक्, मर्त्या त्वक्। तदेतस्मिन्नमृते प्रतिष्ठापयति। तेनास्यैतदमृतं भवति।।७।।

षष्ठी चिति का चयन करता है – यह इसकी वाक् ही है। - - - - -अब पुरीष का निवपन करता है – यह इसका असृक ही है, त्वक् ही है. यह मर्त्य है। असृक् मर्त्य ही है, त्वक् मर्त्य है। - - - -

ता वा एताः षडिष्टकाचितयः, षट् पुरीषचितयः, तद् द्वादश। द्वादश मासाः संवत्सरः। संवत्सरोऽग्निः। यावानग्निर्यावत्यस्य मात्रा तावतैव तत्प्रजापतिरेकधाऽजरममृतमात्मानमकुरुत। तथैवैतद्यजमान एकधाऽजरममृतमात्मानं कुरुते।।८।।

यह इसकी ६ इष्टकाचितियां हैं, ६ पुरीषचितियां हैं। यह १२ हैं। १२ संवत्सर के मास होते हैं। संवत्सर अग्नि है। जहां तक अग्नि है, जहां तक इसकी मात्रा है, वहीं तक प्रजापति ने एक बार स्वयं को अजर अमृत कर लिया। इसी प्रकार यजमान स्वयं को एकधा अजर अमृत करता है।

अथ विकर्णीं च स्वयमातृण्णां चोपधाय – हिरण्यशकलैः प्रोक्षति। अग्निमभ्यादधाति। रूपमेव तत्प्रजापतिर्हिरण्यमन्तत आत्मनोऽकुरुत। तद्यदन्ततः – तस्मादिदमन्त्यमात्मनो रूपम्। तस्माद्ये चैतद्विदुः, ये च न, हिरण्मयोऽग्निचिदमुष्मिँल्लोके सम्भवती – त्येवाहुः।।९।।

अब विकर्णी और स्वयमातृण्णा को स्थापित करके – हिरण्यशकलों से प्रोक्षण करता है। अग्नि की स्थापना करता है। प्रजापति ने अन्त में अपने रूप को ही हिरण्यमय किया। चूंकि अन्त में किया, इसलिए स्वयं का रूप अन्त्य है। इसलिए जो यह इस प्रकार जानते हैं और जो नहीं जानते, उस लोक में हिरण्मय अग्निचिद् होते हैं – ऐसा कहा जाता है।

उपरोक्त आख्यान में जो लोम, त्वक्, मांस, अस्थि, मज्जा आदि मर्त्य तनुओं के उल्लेख हैं, उनका लौकिक लोम, त्वक् आदि से कितना सम्बन्ध है, यह एक विचारणीय प्रश्न है। यदि षष्ठी चिति में वाक् चिति के साथ पुरीष या रेत रूपी असृक् को रखने से असृक् अमृत बनता हो तो इस तथ्य का व्यावहारिक उपयोग भी किया जा सकता है। लेकिन व्यवहार में तो ऐसा कुछ सम्भव प्रतीत नहीं होता है। अतः लोम, त्वक् आदि का कोई और अर्थ भी हो सकता है। फिर, प्राण, अपान आदि की चर्चा के साथ वाक् बीच में कैसे टपक पडी, यह रहस्यमय ही है। वाक् से तात्पर्य या तो उस प्रकृति से लिया जा सकता है जो तामसिक और राजसिक से सात्त्विक रूप में परिणत हो गई है अथवा तान्त्रिक भाषा में इसे परावाक् का वैखरी वाक् में परिणत होना मान सकते हैं। सातवीं चिति में रूप को हिरण्मय बनाया जा रहा है। इस कथन के महत्त्व को इस प्रकार समझा जा सकता है कि बोधगया में बुद्ध की स्वर्णिम प्रतिमा विराजमान है। स्वर्णिम रूप होना यह बुद्धत्व के लक्षणों में से एक है। लेकिन वैदिक साहित्य की उपरोक्त पंक्तियां चेतावनी दे रही हैं कि पहले ६ चितियां अमृत बनेंगी, तभी रूप हिरण्मय बन सकता है।

जैमिनीय उपनिषद ब्राह्मण १.१२.२.६ में लोम, त्वक् आदि को सामगान की हिंकार, प्रस्ताव आदि भक्तियां कहा गया है। कहा गया है कि लोम, त्वक्, मांस, अस्थि व मज्जा के अस्तित्व से पशु पांक्त बनता है । इस कथन के रहस्य को कुछ सीमा तक छान्दोग्य उपनिषद २.१९.१ के इस कथन से समझा जा सकता है कि पशु के लोम, त्वक्, मांस, अस्थि व मज्जा एक सामगान विशेष( यज्ञायज्ञीय नामक) में क्रमशः हिंकार, प्रस्ताव, उद्गीथ, प्रतिहार व निधन के प्रतीक हैं । यह संकेत करता है कि पशु याज्ञिक तभी बन सकता है जब उसमें पांचों भक्तियों का समावेश हो गया हो । पांच भक्तियों को समझने के लिए वाजसनेयि माध्यन्दिन संहिता का निम्नलिखित मन्त्र भी उपयोगी हो सकता है

लोमानि प्रयतिर्मम त्वङ् म ऽआनतिरागति: ।

मांसं म ऽउपनतिर्वस्वस्थि मज्जा मऽआनति: ।। - वा.सं. २०.१३

इस यजु में प्रयति से अर्थ प्रयाण से जाने से हो सकता है, आगति से आने से । जब लोम या रोम हर्षण होने लगे, तब प्रयाण, आरम्भ समझना चाहिए । प्रयति को एक अन्य प्रकार से भी समझा जा सकता है। पुराणों में शरीर में लोमों को पृथिवी के पृष्ठ पर उगी ओषधि - वनस्पतियों के तुल्य समझा जाता है। ओषधि - वनस्पतियों का विकास गुरुत्वाकर्षण के विपरीत दिशा में होता है। सोमयाग में रथन्तर और बृहत् सामों का गान होता है। कहा गया है कि रथन्तर साम द्वारा पृथिवी अपना सर्वश्रेष्ठ अंश चन्द्रमा में धारण कराती है जो चन्द्रमा में शश के रूप में परिलक्षित होता है। बृहत् द्वारा सूर्य अपना भाग पृथिवी में स्थापित करता है। अतः प्रयति से तात्पर्य रथन्तर साम से हो सकता है जबकि आगति से तात्पर्य बृहत् साम से। आनति, उपनति आदि से क्या तात्पर्य हो सकता है, यह अभी अज्ञात है।

     वाजसनेयि संहिता के उपरोक्त यजु में अस्थि को वसु या धन कहा जा रहा है। पुराणों में दधीचि द्वारा देवों के सारे शस्त्रों के तेज को अपनी अस्थियों में धारण करने की कथा आती है।

 इसी प्रकार यह भी अन्वेषणीय है कि प्राण, अपान आदि, जिन्हें अमृत कहा जा रहा है, सामवेद में उनका क्या अर्थ हो सकता है।

अथर्ववेद १५.१५ से १५.१७ सूक्त प्राण, अपान और व्यान के संदर्भ में हैं । इन सूक्तों में प्राण आदि में से प्रत्येक को ७ भागों में विभाजित किया गया है ।

तस्य व्रात्यस्य।१

सप्त प्राणाः सप्तापानाः सप्त व्यानाः।२

तस्य व्रात्यस्य। योऽस्य प्रथमः प्राण ऊर्ध्वो नामायं सो अग्निः।३

तस्य व्रात्यस्य। योऽस्य द्वितीयः प्राणः प्रौढो नामासौ स आदित्यः।४

तस्य व्रात्यस्य। योऽस्य तृतीयः प्राणो३भ्यूढोनामासौ स चन्द्रमाः।५

तस्य व्रात्यस्य। योऽस्य चतुर्थः प्राणो विभूर्नामायं स पवमानः।६

तस्य व्रात्यस्य। योऽस्य पञ्चमः प्राणो योनिर्नाम ता इमा आपः।७

तस्य व्रात्यस्य। योऽस्य षष्ठः प्राणः प्रियो नाम त इमे पशवः।८

तस्य व्रात्यस्य। योऽस्य सप्तमः प्राणोपरिमितो नाम ता इमाः प्रजाः।९

उपरोक्त सूक्त के अनुसार जो प्रिय नामक प्राण है, उसकी पशव: संज्ञा है, जो अपरिमित प्राण है, उसकी प्रजा संज्ञा है । शतपथ ब्राह्मण ११.४.४.८ का कथन है कि जो यज्ञ का न्यून है, वह उसका प्रजनन है और जो अतिरिक्त है, वह पशव्य है । जैमिनीय ब्राह्मण १.३२३ का कथन है कि जो कुछ वाक् द्वारा करता है, वह प्रजा है और जो ऋचा का गान करता है, वह पशु हैं । पशु के बारे में कहा जाता है कि उसकी गति तिर्यक् होती है।

 

तस्य व्रात्यस्य। योऽस्य प्रथमोऽपानः सा पौर्णमासी।१

तस्य व्रात्यस्य। योऽस्य द्वितीयोपानः साष्टका।२

तस्य व्रात्यस्य। योऽस्य तृतीयोपानः सामावास्या।३

तस्य व्रात्यस्य। योऽस्य चतुर्थोऽपानः सा श्रद्धा।४

तस्य व्रात्यस्य। योऽस्य पञ्चमोऽपानः सा दीक्षा।५

तस्य व्रात्यस्य। योऽस्य षष्ठोऽपानः स यज्ञः।६

तस्य व्रात्यस्य। योऽस्य सप्तमोऽपानस्ता इमा दक्षिणाः।७

 

तस्य व्रात्यस्य। योऽस्य प्रथमो व्यानः सेयं भूमिः।१

तस्य व्रात्यस्य। योऽस्य द्वितीयो व्यानस्तदन्तरिक्षम्।२

तस्य व्रात्यस्य। योऽस्य तृतीयो व्यानः सा द्यौः।३

तस्य व्रात्यस्य। योऽस्य चतुर्थो व्यानस्तानि नक्षत्राणि।४

तस्य व्रात्यस्य। योऽस्य पञ्चमो व्यानस्त ऋतवः।५

तस्य व्रात्यस्य। योऽस्य षष्ठो व्यानस्त आर्तवाः।६

तस्य व्रात्यस्य। योऽस्य सप्तमो व्यानः स संवत्सरः।७

तस्य व्रात्यस्य।समानमर्थं परि यन्ति देवाः संवत्सरं वा एतदृतवोनुपरियन्ति व्रात्यं च।८

तस्य व्रात्यस्य। यदादित्यमभिसंविशन्त्यमावास्यां चैव तत्पौर्णासीं च।९

तस्य व्रात्यस्य। एकं तदेषाममृतत्वमित्याहुतिरेव।१०

 

शतपथ ब्राह्मण के कथन में अमृत व्यान के साथ मर्त्य स्नायुओं को रखा गया है। व्यान को इस प्रकार समझा जा सकता है कि अन्दर आने वाला श्वास प्राण है जबकि बाहर निकलने वाला श्वास अपान है। प्राण और अपान के बीच में समय का एक अन्तराल होता है जहां प्राण – अपान का चक्र थम जाता है। सफल प्राण विपश्यना के बारे में कहा जाता है कि अन्दर आने वाला श्वास भी हर्ष उत्पन्न करने वाला बन गया है, बाहर निकलने वाला श्वास भी। लेकिन जो श्वास थम गया है, उसकी चर्चा नहीं सुनी है। अथर्ववेद का उपरोक्त सूक्त व्यान के संदर्भ में सूचना दे रहा है कि व्यान का स्थूल रूप भूमि हो सकता है जबकि सूक्ष्मतम रूप संवत्सर। संवत्सर से तात्पर्य होता है जहां मन, प्राण और वाक् अथवा भौतिक जगत में चन्द्रमा, सूर्य और पृथिवी एक दूसरे से जुड गए हों, एक दूसरे की परिक्रमा करने लगे हों। प्राणायाम के संदर्भ में इसे पूरक, कुम्भक और रेचक कह सकते हैं।

उपरोक्त सूक्त भागवत पुराण के इस कथन समझने में सहायक हो सकते हैं कि राजा प्रियव्रत ने सात द्वीप अपने सात पुत्रों में बांट दिए और फिर उनमें से प्रत्येक द्वीप के ७ – ७ विभाग किए गए। 

प्रथम लेखन - ११-१-२०११ई.( पौष शुक्ल सप्तमी, वि.सं. २०६७)