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महावीर पात्र का यह चित्र ज्योति अप्तोर्याम, गार्गेयपुरम्, कर्नूल, 20जनवरी से 1फरवरी 2015, श्री राजशेखर शर्मा के संग्रह से है।

 

 

महावीर पात्र में गौ पयः प्रक्षेप पर उत्पन्न ज्वाला का यह चित्र ज्योति अप्तोर्याम, गार्गेयपुरम्, कर्नूल, 20जनवरी से 1फरवरी 2015, श्री राजशेखर शर्मा के संग्रह से है।

 

 

 

Chanting of Sama 1-5

1.     साम सं1 का गायन घर्म अञ्जन के समय किया जाता है। अञ्जन से तात्पर्य महावीर पात्र का आहवनीय अग्नि पर घृत से अञ्जन से है। इस साम की तीन बार आवृत्ति की जाती है।

 
 
   
 
 साम सं.2 का गायन गार्हपत्य के समीप वाले प्रवर्ग्य खर पर रुक्मोपधान के समय किया जाता है। रुक्म/चांदी रखने के पश्चात् उस पर महावीर पात्र को स्थापित किया जाता है।

नियुत्वान् वायवा गह्यय ँ शुक्रो अयामि ते। गन्तासि सुन्वतो गृहम्॥

  

  साम सं 3 व 4 का गान महावीर पात्र के परितः अग्नि का अभीन्धन करते समय किया जाता है।

       साम सं 5 का गान महावीर पात्र पर सुवर्णोपधान के समय किया जाता है।

    

Chanting of Sama 1-5


साम सं 6 का गायन उस समय किया जाता है जब अध्वर्यु कहता है कि रुचितो घर्मः

साम सं 7 का गायन धेनु उपसृजन/धेनु के दोहन के समय किया जाता है।

स्वादिष्ठया मदिष्ठया पवस्व सोम धारया। इन्द्राय पातवे सुतः॥

साम सं 8 का गायन पयः आहरण काल में किया जाता है।

 अग्ने युङ्क्ष्वा हि ये तवाश्वासो देव साधवः।  अरं वहन्त्याशवः॥

साम सं9 का गायन घर्म में पयः सेचन काल में किया जाता है।

आ त्वा विशन्त्विन्दवः समुद्रमिव सिन्धवः। न त्वामिन्द्राति रिच्यते॥

 

साम सं 10 व 11 का गायन तब किया जाता है जब शफों से घर्म/महावीर पात्र का ग्रहण किया जाता है।

प्रथश्च यस्य सप्रथश्च नामानुष्टुभस्य हविषो हविर्यत्।

धातुर्द्युतानात् सवितुश्च विष्णो रथन्तरमा जभारा वसिष्ठः॥

 

Chanting of Samas 10-16


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