प्रवर्ग्य

टिप्पणी :

प्रवर्ग्यशब्दस्य तात्पर्यं प्र-वृञ्जनम् अस्ति। वॄ – वरणे। या प्रजाः अस्ति, तस्याः शिरोभवनम्, प्रवरणम्, तस्यां रेतः सिञ्चनम्। अस्य संज्ञा पिन्वनम् अस्ति। आदित्यः अस्मिन् ब्रह्माण्डे सर्वासु प्रजासु रेतःसिञ्चनं करोति। अतएव सः प्रवर्ग्यः अस्ति। तैआ ५.१२.१ यथा सोमयागे द्वादशसु प्रवर्ग्येषु प्रत्यक्षतः भवति, तस्याः व्याख्या उपलब्धा अस्ति।

 

1.वैदिक साहित्य के आधार पर प्रवर्ग्य क्या होता है, इसका अन्वेषण तो अभी नहीं किया गया है, लेकिन सोमयाग में प्रवर्ग्य इष्टि के आधार पर इसका निरूपण किया जा सकता है। प्रवर्ग्य इष्टि में कच्ची मिट्टी से बने एक पात्र में, जिसे महावीर कहा जाता है, घृत भर कर उसका अग्नि पर तापन किया जाता है और जब घृत उबलने लगता है तो उसमें गौ और अज पयः का बारी-बारी से सिंचन किया जाता है। गौ पयः का दोहन अध्वर्यु ऋत्विज करता है जबकि अज पयः का प्रतिप्रस्थाता। प्रत्येक बार उबलते हुए घृत में शीतल पयः का प्रक्षेप करने से बडी ऊंची लपटें निकलती हैं। इसे प्रवर्ग्य नाम दिया जाता है। यह प्रक्रिया 12 या 24 बार दोहराई जाती है जो संवत्सर का प्रतीक है। इस प्रक्रिया के पूरा होने तक सोमलता अतिथि के रूप में विराजमान रहती है। प्रक्रिया पूरी होने पर सोमलता का अभिषवण किया जाता है जिसमें सोमलता को कूटना, निचोडना, छानना, उसमें दुग्ध का प्रक्षेप करना आदि सम्मिलित हैं। इस प्रक्रिया को समझने का सबसे सरल उपाय हमारे जीवन के अनुभव हैं जब सिर में गर्मी सी प्रतीत होने लगती है। यह प्रवर्ग्य का ही एक छोटा सा भाग है। सिर दर्द को भी प्रवर्ग्य का एक भाग ही कहा जा सकता है। यही गर्मी शीतलता में बदल सकती है। कब यह गर्मी शीतलता में बदल जाएगी, इसके बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। पहला व्यावहारिक तथ्य तो यह है कि सामान्य जीवन में ऊर्जा का आरोहण तो सभी में कुछ न कुछ हो ही जाता है, लेकिन अपने प्रयत्नों से इस आरोहण को त्वरित बनाया जा सकता है।

2.संदर्भों से स्पष्ट है कि कच्ची मिट्टी से बना महावीर पात्र हमारा यह शरीर ही है। इस पात्र को घृत से भरने से क्या तात्पर्य हो सकता है, यह बहुत स्पष्ट नहीं है। घृत में पयः की आहुति के संदर्भ में पयः को तनाव से मुक्त अवस्था में जन्मा रस कहा जा सकता है। ऐसी स्थिति में ऊर्जा का आरोहण होने लगता है। सोमयाग से पूर्व प्रवर्ग्य इष्टि क्यों आवश्यक है, इस संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि हमारे जठर में क्षुधा के रूप में जो अग्नि की प्रतीति होती है, उस अग्नि को शान्त करने के क्या – क्या उपाय हो सकते हैं। सबसे सरल उपाय तो स्थूल भोजन कर लेना है। हमारी जठराग्नि भोजन के साथ संयुक्त हो जाती है और क्षुधा समाप्त हो जाती है। भोजन के जिन मूल अवयवों से अग्नि शान्त होती है, उन्हें पयः नाम दिया जा सकता है। आधुनिक विज्ञान की भाषा में उन्हें कार्बोहाईड्रेट, प्रोटीन आदि नाम दिए जा सकते हैं। प्रवर्ग्य इष्टि में संवत्सर पर्यन्त यह परीक्षण करना होता है कि जो भोजन हमने किया है, उसने अग्नि से मिलकर ज्वालाएं, ज्योति उत्पन्न की है या नहीं। व्यवहार में तो प्रायः ऐसा होता है कि जब भोजन कर लिया जाता है तो नींद आ जाती है। इसका कारण यह होता है कि भोजन शरीर से सारी आक्सीजन की मात्रा का अवशोषण कर लेता है जिससे मस्तिष्क को पर्याप्त आक्सीजन नहीं मिल पाती और नींद आ जाती है। अतः सोमयाग कृत्य आरम्भ करने से पूर्व यह जांच आवश्यक है कि संवत्सर पर्यन्त हम ऐसा भोजन करें जिससे नींद नहीं, अपितु ज्योति का जनन हो। जब ऐसा हो जाएगा तो फिर जठराग्नि में सोम की आहुति दी जा सकती है। तब अग्नि और सोम परस्पर मिलकर अग्नीषोमीय ज्योति उत्पन्न करते हैं।

 

3. प्रवर्ग्य की घटना को अन्य तथ्यों के आधार पर भी समझने का प्रयत्न किया जा सकता है। शतपथ ब्राह्मण में केवल अश्वमेध के संदर्भ में ही ब्रह्मौदन के उल्लेख आते हैं। वैदिक साहित्य में दो शब्द आते हैं – ब्रह्मौदन व प्रवर्ग्य। इन दोनों के अन्तर को स्पष्ट रूप से समझना होगा। सबसे पहले सरल व्याख्या के रूप में डा. दयानन्द भार्गव का निम्नलिखित कथन उद्धृत है –

यज्ञ का अर्थ है-आदान-प्रदान। हम किसी से कुछ लें तो किसी को कुछ दें भी। जब हम लेते हैं तो हम अग्नि हैं, जब हम देते हैं तो हम सोम हैं। दोनों के मिश्रण से यज्ञ होता है। प्रश्न होता है कितना लें और कितना दें। उत्तर है कि अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए जितना आवश्यक है उतना लें, शेष बचा हुआ दूसरों को दें। अपनी आवश्यकता पूरी करने पर बच जाता है उसे वेद ने उच्छिष्ट कहा है। इसे यज्ञशेष भी कहा जाता है। आज की भाषा में इसे प्रसाद कहते हैं। अपने लिए जो आवश्यक है, ब्राह्मण ग्रंथ उसे ब्रह्मौदन कहते हैं, जो बच जाए उसे प्रवर्ग्य कहते हैं। एक का प्रवर्ग्य दूसरे का ब्रह्मौदन बने-यह अहिंसक जीवन शैली का मार्ग है। हम दूसरे का ब्रह्मौदन छीनें, यह हिंसक जीवन शैली है। एक उदाहरण लें। पेड़ कार्बनडाइआक्साईड लेता है, वह उसका ब्रह्मौदन है, वह जो ऑक्सीजन छोड़ता है, यह उसका प्रवर्ग्य है। पेड़ का वह प्रवर्ग्य ऑक्सीजन हमारा ब्रह्मौदन बन जाता है और हमारे द्वारा छोड़ा गया कार्बनडाइआक्साईड पेड़ का ब्रह्मौदन बन जाता है। प्राकृतिक जीवन शैली का यही अहिंसक आधार है कि एक का प्रवर्ग्य दूसरा का ब्रह्मौदन बनता रहे और आदान-प्रदान रूप यज्ञ चलता रहे। किंतु सदा यह अहिंसक शैली व्यावहारिक नहीं होती। ऐसे में हमें किसी का ब्रह्मौदन ही लेना पड़े तो उसके प्रायश्चित के रूप में किसी को अपने स्वत्व का कुछ अंश दे भी देना चाहिये। अतः, यज्ञ के साथ तपस् और दान भी धर्म का अंग हैं। दान पदार्थ का त्याग है, तपस् सुख का त्याग है। ये दोनों प्रकार के त्याग यज्ञ में होने वाली न्यूनता की पूर्ति कर देते हैं। - प्रो० दयानन्द भार्गव

4.गोपथ ब्राह्मण १.२.१६ में वृष के दो शीर्ष कहे गए हैं - प्रवर्ग्य और ब्रह्मौदन । शीर्ष का निर्माण उदान प्राण से होता है। इसीलिए इसे ब्रह्म-ओदन/उदान कहा गया है। सारी देह को पकाकर जो फल निकलता है, शीर्ष उसका प्रतीक होता है। ऐसा अनुमान है कि ब्रह्मौदन ब्रह्माण्ड की वह ऊर्जा है जिसका उपयोग दैवी नियमों के अनुसार हो रहा है, वह नियम जिनके अनुसार ऊर्जा का क्षय नहीं होता, प्रेम। ब्रह्मौदन व प्रवर्ग्य, यह दोनों ही उदान प्राण के रूप कहे जा सकते हैं । उदान प्राण का अर्थ होगा वह ऊर्जा जो पृथिवी द्वारा द्युलोक में स्थापित की गई है । अथर्ववेद ११.१ तथा ११.३ सूक्त ब्रह्मौदन देवता के हैं । इन सूक्तों में प्रश्न उठाया गया है कि ब्रह्मौदन की ऊर्जा को देह के विभिन्न  अंग किस देवता के माध्यम से ग्रहण करें । यदि सामान्य स्तर पर ब्रह्मौदन की ऊर्जा को ग्रहण करने का प्रयास किया जाएगा तो वह अङ्ग नष्ट हो जाएगा । अतः जिस  अंग का जो देवता है, उसका आह्वान करके ही ब्रह्मौदन की ऊर्जा को ग्रहण किया जाता है ।

ऐसा प्रतीत होता है कि प्रवर्ग्य ब्रह्माण्ड की वह ऊर्जा है जिसका उपयोग प्रकृति कर रही है और वह ऊर्जा लगातार ऋणात्मकता की ओर जा रही है, उसकी अव्यवस्था में, एण्ट्रांपी में लगातार वृद्धि हो रही है। उसे उच्छिष्ट भी कहा गया है। प्रवर्ग्य शीर्ष की यह विशेषता है कि वह देह से कट कर सारे ब्रह्माण्ड में फैल जाता है।

5. जैसा कि मेघनाद की टिप्पणी में कहा जा चुका है, महापुरुषों के मुख के चित्रों  पर सार्वत्रिक रूप से एक प्रकाश मण्डल दिखाया जाता है। इस आभामण्डल में दोष यह होता है कि यह मण्डल बनता – बिगडता रहता है। जब शरीर के पास अतिरिक्त ऊर्जा होगी तो यह बन जाएगा। अन्यथा नष्ट हो जाएगा। राम, कृष्ण आदि दिव्य पुरुषों के मण्डलों के विषय में यह आशा की जाती है कि उनका आभामण्डल उतार-चढाव की प्रक्रिया से मुक्त होगा।

6. पतङ्गमक्तमसुरस्य मायया हृदा पश्यन्ति मनसा विपश्चितः ।

समुद्रे अन्तः कवयो वि चक्षते मरीचीनां पदमिच्छन्ति वेधसः ॥

पतङ्गो वाचं मनसा बिभर्ति तां गन्धर्वोऽवदद्गर्भे अन्तः ।

तां द्योतमानां स्वर्यं मनीषामृतस्य पदे कवयो नि पान्ति ॥

अपश्यं गोपामनिपद्यमानमा च परा च पथिभिश्चरन्तम् ।

स सध्रीचीः स विषूचीर्वसान आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्तः ॥ - ऋ.10.177

पारम्परिक रूप से इस सूक्त का विनियोग प्रवर्ग्य कर्म के लिए है। पहली ऋचा में असुर की माया से ग्रस्त पतङ्ग का उल्लेख है। पतङ्ग सामान्य जन के प्रवर्ग्य का सूचक हो सकता है जो उतरता – चढता रहता है। इस सूक्त की तीसरी ऋचा में अनिपद्यमान गोपा का उल्लेख है। कहा जा रहा है कि यह गोपा न गिरने वाली है। यह विश्व में (सूर्य की भांति) विचरती रहती है। जैसे सूर्य कभी अस्त नहीं होता, इसी प्रकार यह भी अस्त नहीं होती।

 Sama chants during Pravargya

प्रवर्ग्य

*आरुह्याग्निं स्वयमातृण्णां व्याघारयति । .... अथ प्रत्यवरोहति । प्राणदा अपानदा इति.... प्रत्येत्य प्रवर्ग्योपसद्भ्यां प्रचरति । - माश ९.२.१.१८

*अग्निर्वायुरादित्यस्तदेते प्रवर्ग्याः स यदन्यत्राग्नेरुत्सादयेदेतांस्तद्देवान्बहिर्धैभ्यो लोकेभ्यो दध्याद् । माश ९, २, १, २१ (तु. माश १४, ३, २, २४) ।

*अहोरात्राणि वा उपसदः आदित्यः प्रवर्ग्योऽमुं तदादित्यमहोरात्रेषु प्रतिष्ठापयति – माश १०.२.५.४

*यद्वै दीक्षन्ते। अग्नाविष्णू एव देवते यजन्ते।.....अथ यत् प्रायणीयेन यजन्ते। अदितिमेव देवतां यजन्ते।.....अथ यत् क्रयेण चरन्ति। सोममेव देवतां यजन्ते।.....अथ यदातिथ्येन यजन्ते। विष्णुमेव देवतां यजन्ते।.....अथ यत्प्रवर्ग्येण यजन्ते । आदित्यमेव देवतां यजन्ते । माश १२, १, ३, ५।।

*विष्णोः शिरःछेदनम् -- तद्घृङ्ङिति पपात।  तत्पतित्वाऽसावादित्योऽभवदथेतरः प्राङेव प्रावृज्यत तद्यद्घृङ्ङित्यपतत्तस्माद्घर्मोऽथ यत्प्रावृज्यत तस्मात्प्रवर्ग्यः। माश १४, १, १, १०

*अथ वत्समुपार्जति। पूषाऽसीत्ययं वै पूषा योऽयं पवत एष हीदं सर्वम्पुष्यत्येष उ प्रवर्ग्यः। माश १४, २, १, ९ ।। तं यत्प्रथमयज्ञे प्रवृञ्ज्यात् एषोऽस्य तप्तः शुशुचानः प्रजां च पशूंश्च प्रदहेदथो आयुः प्रमायुको यजमानः स्यात्तस्माद्द्वितीये वैव तृतीये वा- १४.२.२.[४५]

*तं न सर्वस्मा ऽ इव प्रवृञ्ज्यात् । सर्वं वै प्रवर्ग्यः । माश १४, २, २, ४६ ।।

*तदाहुः यदपशिरा अप्रवर्ग्योऽथ केनास्याग्निहोत्रं शीर्षण्वद्भवतीत्याहवनीयेनेति ब्रूयात्कथं दर्शपूर्णमासावित्याज्येन च पुरोडाशेन चेति ब्रूयात्कथं चातुर्मास्यानीति पयस्ययेति ब्रूयात्कथं पशुबन्ध इति पशुना च पुरोडाशेन चेति ब्रूयात्कथं सौम्योऽध्वर इति हविर्धानेनेति ब्रूयात् - १४.२.२.[४८]

*इमे वै लोकाः प्रवर्ग्यः । माश १४, ३, २, २३ ।।

*एता वै देवताः प्रवर्ग्यः। अग्निर्वायुरादित्यः सर्वं वा एता देवता सर्वम्प्रवर्ग्यः स यत्प्रवृक्तस्तदग्निर्यद्रुचितस्तद्वायुर्यत्पिन्वितस्तदसावादित्यो यदा वा असावादित्यः पिन्वतेऽथैनं सर्वे देवाः सर्वाणि भूतान्युपजीवन्ति पिन्वते ह वा अस्मा असावादित्यो य एवमेतद्वेद - १४.३.२.२४

*अग्निहोत्रं वै प्रवर्ग्यः। सर्वं वा अग्निहोत्रं सर्वं प्रवर्ग्यः स यदधिश्रितं तत्प्रवृक्तो यदुन्नीतं तद्रुचितो यद्धुतं तत्पिन्वितो यदा वा अग्निहोत्रम्पिन्वतेऽथैनत्सर्वे देवाः सर्वाणि भूतान्युपजीवन्ति । माश १४, ३, २, २६

*ज्योतिः प्रवर्ग्यः – माश १४.४.१.३२, तैआ ५.१०.४

*असौ खलु वावैष आदित्यः । यत्प्रवर्ग्यः । तैआ ५, ११, १ (तु. माश १०,२, ५, ४; १४, १, १, २७) ।

*ईश्वरो वा एषो ऽन्धो भवितोः । यः प्रवर्ग्यमन्वीक्षते । तैआ ५,३,७ ।।

*तस्य ( अरुणकेतुकस्याग्नेः ) इन्द्रो वम्रिरूपेण धनुर्ज्यामच्छिनत् स्वयं तदिन्द्रधनुरित्यज्यम् ।  अभ्रवर्णेषु चक्षते । एतदेव शंयोर्बार्हस्पत्यस्य । एतद् रुद्रस्य धनुः । रुद्रस्य त्वेव धनुरार्त्निः । शिर उत्पिपेष । स प्रवर्ग्यो ऽभवत् । तस्माद्यः सप्रवर्ग्येण यज्ञेन यजते । रुद्रस्य स शिरः प्रतिदधाति । नैनं रुद्र आरुको भवति -  तैआ १, ५, २ ।।

*तस्य ( मखस्य [यज्ञस्य]) एतच्छिरः यत्प्रवर्ग्यः । तैआ ५, ३, २।

*देवा वै यशस्कामाः सत्त्रमासताग्निरिन्द्रो वायुर्मखस्तेऽब्रुवन्न् यन्नो यश ऋच्छात् तन्नः सहासदिति तेषा मखं यश आर्च्छत् तदादायापाक्रामत् तदस्य प्रासहादित्सन्त तं पर्ययतन्त स्वधनुः प्रतिष्ठाभ्यातिष्ठत् तस्य धनुरार्त्निरूर्ध्वा पतित्वा शिरोऽच्छिनत् स प्रवर्ग्योऽभवद्यज्ञो वै मखो यत् प्रवर्ग्यं प्रवृञ्जन्ति यज्ञस्यैव तच्छिरः प्रतिदधति । तां ७, ५,६

* तस्य ( यज्ञस्य ) धनुर्विप्रमाणं  शिर उदवर्तयत् । तद् द्यावापृथिवी अनु प्रावर्तत । यत्प्रावर्तत । तत्प्रवर्ग्यस्य प्रवर्ग्यत्वम् । तै ५, १, ५ ।।

*तावेतद् यज्ञस्य शिरः प्रत्यधत्ताम् (अश्विनौ ) । यत् प्रवर्ग्यः । तैआ ५, १, ७

*ब्रह्मवर्चसं ( यजमानो [माश,J) वै प्रवर्ग्यः । काठ ३७, ७; माश १४, ३,२, २५।।

*शिरो ( + ह (गो. 3) वा एतद्यज्ञस्य । यत् प्रवर्ग्यः । तैआ ५, ४, ३-४, ६, १; गो २, २,६ । (तु. माश ३, ४, ४, १; ९,२,१,२२; १४,२,१,५; ३,१,१६) ।

*सम्राट् प्रवर्ग्यः । माश १४, १, ३,१२ ।।

*एष वा अग्निर्वैश्वानरो यत् प्रवर्ग्यः – तैआ ५.१०.५

*असौ खलु वा आदित्यः प्रवर्ग्यः – तैआ ५.९.२

*असौ खलु वा आदित्यः प्रवर्ग्यः  तस्य मरुतो रश्मयः।  स्वाहा मरुद्भिः परि श्रयस्वेत्याह । अमुमेवादित्यँ रश्मिभिः पर्यूहति । तस्मादसावादित्योऽमुष्मिँल्लोके रश्मिभिः पर्यूढः । तस्माद्राजा विशा पर्यूढः । तस्माद्ग्रामणीः सजातैः पर्यूढः । – तैआ ५.४.८

*शिरो वा एतद्यज्ञस्य ३ यत्प्रवर्ग्यः । ऊर्ङ्मुञ्जाः । यन्मौञ्जो वेदो भवति । ऊर्जैव यज्ञस्य शिरः समर्धयति । - तैआ ५.४.

*तद्यत्तद्यज्ञस्य शिरोऽच्छिद्यतेति , सो ऽसावादित्यः, स उ एव प्रवर्ग्यः। तौ ह दध्यञ्चम् आथर्वणम् आजग्मतुः। .... – जै ३.१२६

*गायत्री देवेभ्यो ऽपाक्रामत्। तां देवाः प्रवर्ग्येणैवानुव्यभवन्। प्रवर्ग्यैणाप्नुवन्। यच्चतुर्विँशतिः कृत्वः प्रवर्ग्यं प्रवृणक्ति । गायत्रीमेव तदनु वि भवति । गायत्रीमाप्नोति । पूर्वास्य जनं यतः कीर्तिर्गच्छति । वैश्वदेवः सँ सन्नः ३ वसवः प्रवृक्तः । सोमोऽभिकीर्यमाणः । आश्विनः पयस्यानीयमाने । मारुतः क्वथन् । पौष्ण उदन्तः सारस्वतो विष्यन्दमानः । मैत्रः शरोगृहीतः । तेज उद्यतो वायुः । ह्रियमाणः प्रजापतिः । हूयमानो वाग्घृतः ४ असौ खलु वावैष आदित्यः । यत्प्रवर्ग्यः । - तैआ ५.११.३

*सविता भूत्वा प्रथमेऽहन्प्र वृज्यते । तेन कामाँ एति । यद्द्वितीयेऽहन्प्रवृज्यते । अग्निर्भूत्वा देवानेति । यत्तृतीयेऽहन्प्रवृज्यते । वायुर्भूत्वा प्राणानेति । यच्चतुर्थेऽहन्प्रवृज्यते । आदित्यो भूत्वा रश्मीनेति । यत्पञ्चमे हन्प्रवृज्यते । चन्द्रमा भूत्वा नक्षत्राण्येति १ यत्षष्ठेऽहन्प्रवृज्यते । ऋतुर्भूत्वा संवत्सरमेति । यत्सप्तमेऽहन्प्रवृज्यते । धाता भूत्वा शक्वरीमेति । यदष्टमेऽहन्प्रवृज्यते । बृहस्पतिर्भूत्वा गायत्रीमेति । यन्नवमेऽहन्प्रवृज्यते । मित्रो भूत्वा त्रिवृत इमाँ लोकानेति । यद्दशमेऽहन्प्रवृज्यते । वरुणो भूत्वा विराजमेति २ यदेकादशेऽहन्प्रवृज्यते । इन्द्रो भूत्वा त्रिष्टुभमेति । यद्द्वादशेऽहन्प्रवृज्यते । सोमो भूत्वा सुत्यामेति । - तैआ ५.१२.१

*तेजः प्रवर्ग्यः – तैआ ५.३.२, १०.३

*प्रजापतिर्वा एष द्वादशधा विहितो यत्प्रवर्ग्यः - तैआ ५.११.६

*चतुःस्रक्तिर्नाभिरृतस्येत्याह ६ इयं वा ऋतम् । तस्या एष एव नाभिः । यत्प्रवर्ग्यः । – तैआ ५.९.७