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टिप्पणी :

प्रवर्ग्य

 

 

महावीर पात्र का यह चित्र ज्योति अप्तोर्याम, गार्गेयपुरम्, कर्नूल, 20जनवरी से 1फरवरी 2015, श्री राजशेखर शर्मा के संग्रह से है।

 

 

महावीर पात्र में गौ पयः प्रक्षेप पर उत्पन्न ज्वाला का यह चित्र ज्योति अप्तोर्याम, गार्गेयपुरम्, कर्नूल, 20जनवरी से 1फरवरी 2015, श्री राजशेखर शर्मा के संग्रह से है।

 

 

 

टिप्पणी :

1.वैदिक साहित्य के आधार पर प्रवर्ग्य क्या होता है, इसका अन्वेषण तो अभी नहीं किया गया है, लेकिन सोमयाग में प्रवर्ग्य इष्टि के आधार पर इसका निरूपण किया जा सकता है। प्रवर्ग्य इष्टि में कच्ची मिट्टी से बने एक पात्र में, जिसे महावीर कहा जाता है, घृत भर कर उसका अग्नि पर तापन किया जाता है और जब घृत उबलने लगता है तो उसमें गौ और अज पयः का बारी-बारी से सिंचन किया जाता है। गौ पयः का दोहन अध्वर्यु ऋत्विज करता है जबकि अज पयः का प्रतिप्रस्थाता। प्रत्येक बार उबलते हुए घृत में शीतल पयः का प्रक्षेप करने से बडी ऊंची लपटें निकलती हैं। इसे प्रवर्ग्य नाम दिया जाता है। यह प्रक्रिया 12 या 24 बार दोहराई जाती है जो संवत्सर का प्रतीक है। इस प्रक्रिया के पूरा होने तक सोमलता अतिथि के रूप में विराजमान रहती है। प्रक्रिया पूरी होने पर सोमलता का अभिषवण किया जाता है जिसमें सोमलता को कूटना, निचोडना, छानना, उसमें दुग्ध का प्रक्षेप करना आदि सम्मिलित हैं। इस प्रक्रिया को समझने का सबसे सरल उपाय हमारे जीवन के अनुभव हैं जब सिर में गर्मी सी प्रतीत होने लगती है। यह प्रवर्ग्य का ही एक छोटा सा भाग है। सिर दर्द को भी प्रवर्ग्य का एक भाग ही कहा जा सकता है। यही गर्मी शीतलता में बदल सकती है। कब यह गर्मी शीतलता में बदल जाएगी, इसके बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। पहला व्यावहारिक तथ्य तो यह है कि सामान्य जीवन में ऊर्जा का आरोहण तो सभी में कुछ न कुछ हो ही जाता है, लेकिन अपने प्रयत्नों से इस आरोहण को त्वरित बनाया जा सकता है।

2.संदर्भों से स्पष्ट है कि कच्ची मिट्टी से बना महावीर पात्र हमारा यह शरीर ही है। इस पात्र को घृत से भरने से क्या तात्पर्य हो सकता है, यह बहुत स्पष्ट नहीं है। घृत में पयः की आहुति के संदर्भ में पयः को तनाव से मुक्त अवस्था में जन्मा रस कहा जा सकता है। ऐसी स्थिति में ऊर्जा का आरोहण होने लगता है। सोमयाग से पूर्व प्रवर्ग्य इष्टि क्यों आवश्यक है, इस संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि हमारे जठर में क्षुधा के रूप में जो अग्नि की प्रतीति होती है, उस अग्नि को शान्त करने के क्या – क्या उपाय हो सकते हैं। सबसे सरल उपाय तो स्थूल भोजन कर लेना है। हमारी जठराग्नि भोजन के साथ संयुक्त हो जाती है और क्षुधा समाप्त हो जाती है। भोजन के जिन मूल अवयवों से अग्नि शान्त होती है, उन्हें पयः नाम दिया जा सकता है। आधुनिक विज्ञान की भाषा में उन्हें कार्बोहाईड्रेट, प्रोटीन आदि नाम दिए जा सकते हैं। प्रवर्ग्य इष्टि में संवत्सर पर्यन्त यह परीक्षण करना होता है कि जो भोजन हमने किया है, उसने अग्नि से मिलकर ज्वालाएं, ज्योति उत्पन्न की है या नहीं। व्यवहार में तो प्रायः ऐसा होता है कि जब भोजन कर लिया जाता है तो नींद आ जाती है। इसका कारण यह होता है कि भोजन शरीर से सारी आक्सीजन की मात्रा का अवशोषण कर लेता है जिससे मस्तिष्क को पर्याप्त आक्सीजन नहीं मिल पाती और नींद आ जाती है। अतः सोमयाग कृत्य आरम्भ करने से पूर्व यह जांच आवश्यक है कि संवत्सर पर्यन्त हम ऐसा भोजन करें जिससे नींद नहीं, अपितु ज्योति का जनन हो। जब ऐसा हो जाएगा तो फिर जठराग्नि में सोम की आहुति दी जा सकती है। तब अग्नि और सोम परस्पर मिलकर अग्नीषोमीय ज्योति उत्पन्न करते हैं।

 

3. प्रवर्ग्य की घटना को अन्य तथ्यों के आधार पर भी समझने का प्रयत्न किया जा सकता है। शतपथ ब्राह्मण में केवल अश्वमेध के संदर्भ में ही ब्रह्मौदन के उल्लेख आते हैं। वैदिक साहित्य में दो शब्द आते हैं – ब्रह्मौदन व प्रवर्ग्य। इन दोनों के अन्तर को स्पष्ट रूप से समझना होगा। सबसे पहले सरल व्याख्या के रूप में डा. दयानन्द भार्गव का निम्नलिखित कथन उद्धृत है –

यज्ञ का अर्थ है-आदान-प्रदान। हम किसी से कुछ लें तो किसी को कुछ दें भी। जब हम लेते हैं तो हम अग्नि हैं, जब हम देते हैं तो हम सोम हैं। दोनों के मिश्रण से यज्ञ होता है। प्रश्न होता है कितना लें और कितना दें। उत्तर है कि अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए जितना आवश्यक है उतना लें, शेष बचा हुआ दूसरों को दें। अपनी आवश्यकता पूरी करने पर बच जाता है उसे वेद ने उच्छिष्ट कहा है। इसे यज्ञशेष भी कहा जाता है। आज की भाषा में इसे प्रसाद कहते हैं। अपने लिए जो आवश्यक है, ब्राह्मण ग्रंथ उसे ब्रह्मौदन कहते हैं, जो बच जाए उसे प्रवर्ग्य कहते हैं। एक का प्रवर्ग्य दूसरे का ब्रह्मौदन बने-यह अहिंसक जीवन शैली का मार्ग है। हम दूसरे का ब्रह्मौदन छीनें, यह हिंसक जीवन शैली है। एक उदाहरण लें। पेड़ कार्बनडाइआक्साईड लेता है, वह उसका ब्रह्मौदन है, वह जो ऑक्सीजन छोड़ता है, यह उसका प्रवर्ग्य है। पेड़ का वह प्रवर्ग्य ऑक्सीजन हमारा ब्रह्मौदन बन जाता है और हमारे द्वारा छोड़ा गया कार्बनडाइआक्साईड पेड़ का ब्रह्मौदन बन जाता है। प्राकृतिक जीवन शैली का यही अहिंसक आधार है कि एक का प्रवर्ग्य दूसरा का ब्रह्मौदन बनता रहे और आदान-प्रदान रूप यज्ञ चलता रहे। किंतु सदा यह अहिंसक शैली व्यावहारिक नहीं होती। ऐसे में हमें किसी का ब्रह्मौदन ही लेना पड़े तो उसके प्रायश्चित के रूप में किसी को अपने स्वत्व का कुछ अंश दे भी देना चाहिये। अतः, यज्ञ के साथ तपस् और दान भी धर्म का अंग हैं। दान पदार्थ का त्याग है, तपस् सुख का त्याग है। ये दोनों प्रकार के त्याग यज्ञ में होने वाली न्यूनता की पूर्ति कर देते हैं। - प्रो० दयानन्द भार्गव

4.गोपथ ब्राह्मण में वृष के दो शीर्ष कहे गए हैं - प्रवर्ग्य और ब्रह्मौदन । शीर्ष का निर्माण उदान प्राण से होता है। इसीलिए इसे ब्रह्म-ओदन/उदान कहा गया है। सारी देह को पकाकर जो फल निकलता है, शीर्ष उसका प्रतीक होता है। ऐसा अनुमान है कि ब्रह्मौदन ब्रह्माण्ड की वह ऊर्जा है जिसका उपयोग दैवी नियमों के अनुसार हो रहा है, वह नियम जिनके अनुसार ऊर्जा का क्षय नहीं होता, प्रेम। ब्रह्मौदन व प्रवर्ग्य, यह दोनों ही उदान प्राण के रूप कहे जा सकते हैं । उदान प्राण का अर्थ होगा वह ऊर्जा जो पृथिवी द्वारा द्युलोक में स्थापित की गई है । अथर्ववेद ११.१ तथा ११.३ सूक्त ब्रह्मौदन देवता के हैं । इन सूक्तों में प्रश्न उठाया गया है कि ब्रह्मौदन की ऊर्जा को देह के विभिन्न  अंग किस देवता के माध्यम से ग्रहण करें । यदि सामान्य स्तर पर ब्रह्मौदन की ऊर्जा को ग्रहण करने का प्रयास किया जाएगा तो वह अङ्ग नष्ट हो जाएगा । अतः जिस  अंग का जो देवता है, उसका आह्वान करके ही ब्रह्मौदन की ऊर्जा को ग्रहण किया जाता है ।

ऐसा प्रतीत होता है कि प्रवर्ग्य ब्रह्माण्ड की वह ऊर्जा है जिसका उपयोग प्रकृति कर रही है और वह ऊर्जा लगातार ऋणात्मकता की ओर जा रही है, उसकी अव्यवस्था में, एण्ट्रांपी में लगातार वृद्धि हो रही है। उसे उच्छिष्ट भी कहा गया है। प्रवर्ग्य शीर्ष की यह विशेषता है कि वह देह से कट कर सारे ब्रह्माण्ड में फैल जाता है।

5. जैसा कि मेघनाद की टिप्पणी में कहा जा चुका है, महापुरुषों के मुख के चित्रों  पर सार्वत्रिक रूप से एक प्रकाश मण्डल दिखाया जाता है। इस आभामण्डल में दोष यह होता है कि यह मण्डल बनता – बिगडता रहता है। जब शरीर के पास अतिरिक्त ऊर्जा होगी तो यह बन जाएगा। अन्यथा नष्ट हो जाएगा। राम, कृष्ण आदि दिव्य पुरुषों के मण्डलों के विषय में यह आशा की जाती है कि उनका आभामण्डल उतार-चढाव की प्रक्रिया से मुक्त होगा।

6. पतङ्गमक्तमसुरस्य मायया हृदा पश्यन्ति मनसा विपश्चितः ।

समुद्रे अन्तः कवयो वि चक्षते मरीचीनां पदमिच्छन्ति वेधसः ॥

पतङ्गो वाचं मनसा बिभर्ति तां गन्धर्वोऽवदद्गर्भे अन्तः ।

तां द्योतमानां स्वर्यं मनीषामृतस्य पदे कवयो नि पान्ति ॥

अपश्यं गोपामनिपद्यमानमा च परा च पथिभिश्चरन्तम् ।

स सध्रीचीः स विषूचीर्वसान आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्तः ॥ - ऋ.10.177

डा. कल्याणरमण ने ऋग्वेद 10.177 मायाभेद सूक्त का विनियोग   धातुकर्म के लिए करने का प्रयास किया है। जैसा कि डा. कल्याणरमण ने अपने लेख में इंगित किया है, पारम्परिक रूप से इस सूक्त का विनियोग प्रवर्ग्य कर्म के लिए है। पहली ऋचा में असुर की माया से ग्रस्त पतङ्ग का उल्लेख है। पतङ्ग सामान्य जन के प्रवर्ग्य का सूचक हो सकता है जो उतरता – चढता रहता है। इस सूक्त की तीसरी ऋचा में अनिपद्यमान गोपा का उल्लेख है। कहा जा रहा है कि यह गोपा न गिरने वाली है। यह विश्व में (सूर्य की भांति) विचरती रहती है। जैसे सूर्य कभी अस्त नहीं होता, इसी प्रकार यह भी अस्त नहीं होती।

 

1.     साम सं1 का गायन घर्म अञ्जन के समय किया जाता है। अञ्जन से तात्पर्य महावीर पात्र का आहवनीय अग्नि पर घृत से अञ्जन से है। इस साम की तीन बार आवृत्ति की जाती है।

 
 
   
 
 साम सं.2 का गायन गार्हपत्य के समीप वाले प्रवर्ग्य खर पर रुक्मोपधान के समय किया जाता है। रुक्म/चांदी रखने के पश्चात् उस पर महावीर पात्र को स्थापित किया जाता है।

नियुत्वान् वायवा गह्यय ँ शुक्रो अयामि ते। गन्तासि सुन्वतो गृहम्॥

  

 साम सं. 3  का गायन महावीर पात्र पर हिरण्य/स्वर्ण रुक्म रखते समय किया जाता है।

 अत्राह गोरमन्वत नाम त्वष्टुरपीच्यम्। इत्था चन्द्रमसो गृहे॥

 

 साम सं. 4 व 5 का गायन महावीर पात्र के परितः अग्नि का अभीन्धन करते समय किया जाता है।

 

  प्र सोम देववीतये सिन्धुर्न पिप्ये अर्णसा।

  अ ँशोः पयसा मदिरो न जागृविरच्छा कोशं मधुश्चुतम्॥

 

 

 

साम सं 6 का गायन उस समय किया जाता है जब अध्वर्यु कहता है कि रुचितो घर्मः

साम सं 7 का गायन धेनु उपसृजन/धेनु के दोहन के समय किया जाता है।

स्वादिष्ठया मदिष्ठया पवस्व सोम धारया। इन्द्राय पातवे सुतः॥

साम सं 8 का गायन पयः आहरण काल में किया जाता है।

 अग्ने युङ्क्ष्वा हि ये तवाश्वासो देव साधवः।  अरं वहन्त्याशवः॥

साम सं9 का गायन घर्म में पयः सेचन काल में किया जाता है।

आ त्वा विशन्त्विन्दवः समुद्रमिव सिन्धवः। न त्वामिन्द्राति रिच्यते॥

 

साम सं 10 व 11 का गायन तब किया जाता है जब शफों से घर्म/महावीर पात्र का ग्रहण किया जाता है।

प्रथश्च यस्य सप्रथश्च नामानुष्टुभस्य हविषो हविर्यत्।

धातुर्द्युतानात् सवितुश्च विष्णो रथन्तरमा जभारा वसिष्ठः॥

 

 


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