prayaga

            The word Prayaaga is quite akin to the word Prayaaja, an act performed in yagas/sacrifices. In order to establish the similarity between the two, one has to understand first what Prayaaja is in yagas, what is the purpose behind it, what is the procedure for performing it etc.. There is an indication that there are two types of life forces or gods to be propitiated  in yagas – those whose advancement is very fast and those whose advancement is slow. Those who are fast, are offered the oblation of Soma. Those who are slow, they get the oblation of only butter(Aajya). It seems that the slow rising forces have been named as animals and at last, these animals have to be killed with the sword of knowledge. It is important to know the esoteric aspect of Aajya. This word seems to be derived from the state of  Aja(trivial meaning goat). Aja means where there is no generation of any thought in the mind – tranquil state. This state gives rise to a form of nectar called Aajya. This is the juice by which all the life forces blossom, like in spring. The whole process of annihilation of animal instinct has three parts – One, incorporation of life forces into otherwise rigid matter, killing of the animal and then proper utilization of those animal instincts which still persist. It has been said that the first part is like the head in a body while the third part is like the baser or lower part of the body. The first part has further 5 or 11 subparts while the third part may have 3 or 11 subparts. Each subpart has it’s specific purpose. In vedic literature, a question has been raised whether one can separately perform the first and third parts. But according to answer, it is not generally possible. Both are inseparable.

            The faster equivalent of Prayaaja is called Upasada ishti. In a yaga, either one of the two - Upasada ishti or Prayaaja is performed. In Upasada ishti, there comes the mention of three abodes of demons – iron like at the earth, silver like in the sky and gold like in the heavens. These have to be conquered by Gods. And as puraanic stories say, these three can be conquered only by a single arrow at a particular moment when these three meet together. This indicates that there may be some hidden fact behind the confluence of three rivers at Prayaaga.

            Regarding the puraanic contexts of stories about Prayaaga, one story starts like this : Demon Shankhaasura steals Vedas from sleeping Brahmaa and carries these away into ocean. Then lord Vishnu in the form of a fish kills the demon. In the meanwhile, the Vedas get mixed in the water of the ocean. Vishnu invokes all the sages to collect and says that until this work is completed, he will remain situated in Prayaaga. When the sages collect different parts of Vedas from the ocean, these different parts get their nomenclature according to which sage collected them. In this story, the demonical nature of Shankha/conch may be judged on the basis of yaga procedure where saama is sung for the satisfaction of immortal gods while mantras are recited for the satisfaction of mortal part. It is expected that mantra recitation involves both Shruti and Smriti. When Shruti is lost, then it may be called demonical. This may be the demon Shankhaasura.

            One important difference between oblations of Soma and Aajya is that Aajya oblation has been stated to be offered generally without any proper name. The concept of name is not yet developed. On the other hand, when sages collect the mantras of Vedas, then these mantras get a name.

            In other puraanic stories, Prayaaga has been stated to fulfill the desire. The arousal of desire is clearly a step forward from a no – name status. The other speciality of Prayaaga has been stated to be that here the river Ganges flows westward. West direction in vedic literature is connected with burning one’s sins. Ganges is generally considered to impart knowledge. It is rare that it can be used to eliminate sins also. Yamuna is connected with actions.  And puraanic stories state so much about the significance of taking a bath at the confluence of Gangaa and Yamunaa in the month of Maagha/January – February. This is the season of greatest cold. But the word meaning of word Maagha is when there is no sin left.

            The most interesting of the stories about Prayaaga is the offering of best food by the wife of sage Bharadwaaja. In vedic literature the Prayaaja act has been stated to be performed in different directions according to what one desires to achieve. One of these desires is the attainment of best food. Whether other types of desires also appear in puraanic stories, is yet to be seen. The means of fulfilling the desire is the development of life forces which can invoke from the universe, just as a frog invokes rain in vedic literature. The words Bharata and Bharadwaaja can also be taken in the same sense. But Bharadwaaja is taken in the sense of mind also and the justification for his establishment in Prayaaga by the authors of puraanas has yet to be properly established.

   Also see : Kadru

प्रयाग

टिप्पणी : पुराणों का प्रयाग शब्द वैदिक साहित्य के प्रयाज शब्द से साम्य रखता है । यह अन्वेषणीय है कि क्या प्रयाग और प्रयाज शब्दों में वास्तव में कोई साम्य है ? इस प्रश्न का उत्तर ढूंढने के लिए पहले यह समझना होगा कि यज्ञ में प्रयाज और अनुयाज कर्म क्या होते हैं, उनका क्या उद्देश्य है । शांखायन ब्राह्मण १८.१० से ऐसा संकेत मिलता है कि प्रयाज - अनुयाज कर्म अङ्गिरसों का मार्ग है । जैसा कि अङ्गिरस शब्द की टिप्पणी में कहा जा चुका है, अङ्गिरस प्राण धीरे - धीरे प्रगति करने वाले प्राण हैं ( इसके विपरीत आदित्य आदि तीव्र गति से प्रगति करने वाले प्राण हैं ) । बहुत से यज्ञों में मुख्य याग के प्रारम्भ में प्रयाज कर्म होता है । यह संकेत देता है कि यज्ञ में त्वरित गति से प्रगति करने वाले देवों और मन्द गति से प्रगति करने वाले अङ्गिरसों, दोनों का ध्यान रखना होता है । ऐतरेय ब्राह्मण २.१८ में ८ वसु, ११ रुद्र आदि ३३ देवों को सोमपा कहा गया है जबकि ११ प्रयाजों, ११ अनुयाजों व ११ उपयाजों को असोमपा और पशुभाजना: कहा गया है । असोमपा देवों की तृप्ति पशुओं द्वारा की जाती है ।

           प्रयाज - अनुयाज कर्म में आज्य, पशु व पृषदाज्य का महत्त्वपूर्ण स्थान है । तैत्तिरीय संहिता ६.३.११.६ में उल्लेख आता है कि प्रजापति ने यज्ञ का सृजन किया । उसने पूर्व में आज्य का सृजन किया, मध्य में पशु का और पश्चात् पृषदाज्य का । इस कारण से प्रयाज का यजन आज्य द्वारा होता है, पशु द्वारा मध्य में और पृषदाज्य द्वारा अनुयाज कर्म होता है ( तुलनीय : प्रयाज प्रातःसवन, अनुयाज तृतीय सवन, पुरोडाश माध्यन्दिन सवन - शतपथ ब्राह्मण ११.७.२.४) । सामान्य भाषा में आज्य का अर्थ होता है वह नवनीत जो पयः के ऊपर अपने आप, बिना मथे प्रकट हो जाता है ( शतपथ ब्राह्मण ५.३.२.६) । लेकिन आज्य के प्रसंग को ध्यान में रखते हुए आज्य का कोई गंभीर अर्थ ढूंढना होगा । जैसा कि आज्य की टिप्पणी में कहा गया है, ऐसा प्रतीत होता है कि साधना की अज अवस्था से प्रकट होने वाला रस, सार आज्य कहलाता है । अज अवस्था को प्राप्त करने के लिए अन्तर्मुखी होना पडता है, किसी भी विचार आदि का जन्म न हो, अजन्मा अवस्था । पुरुष सूक्त में उल्लेख आता है कि वसन्तो अस्यासीदाज्यं - वसन्त ही इसका आज्य था । वसन्त में प्रकृति में सारे प्राण जाग उठते हैं, मधु का साम्राज्य स्थापित हो जाता है । पहले आत्मा रूपी अज अवस्था को प्राप्त किया, फिर उसमें नवीन प्राणों को स्थापित किया ।

           शतपथ ब्राह्मण ३.८.१.३-४ में उल्लेख है कि सोमयाग में ११ प्रयाजों का अनुष्ठान किया जाता है जिनमें से १० प्रयाज १० प्राणों के प्रतीक हैं और आत्मा ११वां है । दस प्रयाजों की इष्टि के पश्चात् पशु के वध/संज्ञपन के लिए शास/असि का ग्रहण किया जाता है ( यह शास ज्ञान की शास हो सकती है ) । शांखायन ब्राह्मण ३.४ का कथन है कि पशु प्रयाज हैं और रुद्र स्विष्टकृत् है । ऐसा प्रतीत होता है कि पशु वह जीवात्मा है जिसको अतीन्द्रिय दर्शन की शक्ति प्राप्त नहीं है । सामान्य प्रकृति - प्रदत्त इन्द्रियों से सत्य का दर्शन नहीं किया जा सकता । अतः पशु का संज्ञपन करने की आवश्यकता पडती है । फिर भी जो पाशविक वृत्तियां शेष रह जाती होंगी, उनका निबटारा अनुयाज द्वारा किया जाता होगा । शतपथ ब्राह्मण ३.८.४.८ में पशुओं को अनुयाज कहा गया है ।

          यज्ञ में प्रयाज विधि तथा उसके उद्देश्यों का वर्णन तैत्तिरीय संहिता २.६.१.१ में उपलब्ध है । इस वर्णन के अनुसार प्रायः पांच प्रयाज होते हैं और तीन अनुयाज ( अन्यत्र प्रयाजों की संख्या ११ और अनुयाजों की संख्या भी ११ प्राप्त होती है ) । प्रयाज मन्त्रों के अनुसार प्रथम प्रयाज मन्त्र में अग्नि में समिधा की प्रतिष्ठा की जाती है । प्रथम प्रयाज वसन्त ऋतु का प्रतीक है । दूसरे प्रयाज में तनूनपात् का उल्लेख आता है जो ग्रीष्म ऋतु का प्रतीक है । तीसरे प्रयाज मन्त्र में इड का उल्लेख है जो वर्षा ऋतु का प्रतीक है । कहा गया है कि इड से पशुओं में प्रतिष्ठा होती है । चौथे प्रयाज मन्त्र में बर्हि का उल्लेख आता है जो शरद ऋतु का प्रतीक है । पांचवें प्रयाज मन्त्र में स्वाहा का उल्लेख है जो हेमन्त ऋतु का प्रतीक है( शतपथ ब्राह्मण १.५.३.९) । प्रथम प्रयाज में प्रतीत होता है कि आत्मा में या जड पदार्थ में प्राणों की, चेतनता की प्रतिष्ठा की जाती है । दूसरे प्रयाज में इस प्रतिष्ठा को शीर्ष स्तर तक पहुंचाया जाता है और कहा गया है कि यह  रेतः है । ऐसा प्रतीत होता है कि दूसरे प्रयाज को ग्रीष्म ऋतु से सम्बद्ध करने के पीछे उद्देश्य यह है कि  जैसे सूर्य ग्रीष्म ऋतु में पृथिवी से जल का कर्षण करता है, वैसे ही अध्यात्म में ग्रीष्म ऋतु उत्पन्न करके रस का, रेतः का कर्षण करना है । तीसरे प्रयाज में इस रेतः का वर्षण किया जाता है जिससे प्रजा की, प्रज्ञा की उत्पत्ति हो सके । ऐसा हो सकता है कि इड/इडा अचेतन मन का प्रतीक हो जो दिव्य वर्षा से चेतन मन में बदल जाता हो । चतुर्थ प्रयाज में भूमा की स्थिति होती है जिसमें आत्मा व प्रजा में कोई भेद नहीं रह जाता, आनन्द ही आनन्द रह जाता है । पंचम प्रयाज में यह प्रजा स्व वश में स्थित होती है ( शतपथ ब्राह्मण १.५.४.१) । चार प्रयाजों तक तो देवों और असुरों का मिथुन रहता है लेकिन पांचवें प्रयाज द्वारा देवगण एकाधिकार प्राप्त कर लेते हैं ( शतपथ ब्राह्मण १.५.४.६) ।

प्रयाज व उपसद इष्टि में सम्बन्ध : शतपथ ब्राह्मण ११.२.७.२७ में  उल्लेख है कि दर्शपूर्ण मास यज्ञ के उपसद अनुयाज हैं । प्रयाज - अनुयाज को समझने के लिए उपसद इष्टियों की प्रक्रिया को समझना आवश्यक होगा । जैसा कि अन्यत्र भी टिप्पणियों में उल्लेख किया जा चुका है, सोमयाग के पूर्व किए जाने वाली प्रवर्ग्य - उपसद इष्टियों में प्रवर्ग्य रूपी शीर्ष प्राणों की स्थापना के पश्चात् इस शीर्ष को ग्रीवा पर स्थापित करने के लिए एक ग्रीवा का निर्माण किया जाता है जिसे उपसद इष्टि की संज्ञा दी गई है । एक श्रेष्ठ शिर के लिए श्रेष्ठ ग्रीवा भी अनिवार्य है । अन्यत्र कहा गया है कि उपसदों द्वारा देवों ने यज्ञ की वेदी से असुरों को निकाल बाहर किया । उपसद एक प्रकार से यज्ञ के वर्म, कवच का कार्य करते हैं । इसी प्रकार प्रयाज व अनुयाज भी देवों के वर्म का कार्य करते हैं ( तैत्तिरीय संहिता २.६.१.१, ऐतरेय ब्राह्मण १.२६) । लेकिन यह महत्त्वपूर्ण है कि किसी यज्ञ विशेष के लिए उपसद इष्टि या प्रयाज - अनुयाज कर्म में से एक का चयन किया जाता है । शतपथ ब्राह्मण १४.२.२.५१ में घर्म प्रचरण कर्म में प्रयाज - अनुयाजों का निषेध है । वहां उपसद इष्टि का विधान है । ऐतरेय ब्राह्मण १.२६ में उपसद इष्टि में प्रयाजानुयाज का निषेध किया गया है । इसका कारण यह बताया गया है कि उपसद इष्टि में इषु, शल्य और तेजन, इन तीनों को प्रखर बनाया जाता है । प्रयाजानुयाज करने से इनकी तीव्रता मन्द पड जाती है । वैदिक साहित्य से यह कथन स्पष्ट नहीं होता । पौराणिक कथाओं में शिव द्वारा त्रिपुर नाश की कथा के माध्यम से इस कथन की व्याख्या की गई है । पुराणों की कथा के अनुसार त्रिपुर के तीन पुरों का नाश किसी एक विशेष क्षण में ही हो सकता है जब तीनों पुरों का परस्पर मिलन होता है और उसके लिए एक ही इषु/तीर का चलाना आवश्यक है । पुराणों में इस तीर के निर्माण का विस्तृत वर्णन है । वैदिक साहित्य में( वाजसनेयि माध्यन्दिन संहिता ५.८ इत्यादि ) उपसद इष्टि के मन्त्रों में केवल इतना उल्लेख आता है कि 'या ते अग्ने अयःशया तनू वर्षिष्ठा गह्वरेष्ठा । - - - - या ते अग्ने रज:शया तनू वर्षिष्ठा गह्वरेष्ठा । - - - या ते अग्ने हर:शया तनू वर्षिष्ठा गह्वरेष्ठा ।' इत्यादि । इन तीन मन्त्रों में से एक - एक का उच्चारण एक दिन में किए जाने वाले तीन उपसदों में क्रमशः किया जाता है । इस प्रकार यहां अयोमय, रजतमय और हिरण्मय तीन प्रकार के पुरों का उल्लेख आता है । पुराणों के अनुसार उपसद इष्टि में इन तीन पुरों की जय का कार्य तीव्र गति से, एक ही तीर द्वारा किया जाता है जबकि प्रयाज - अनुयाज एक मन्द गति से प्रगति करने का कृत्य है । ऐतरेय ब्राह्मण १.१७ के अनुसार आतिथ्येष्टि में केवल प्रयाजों का अनुष्ठान किया जाता है, अनुयाजों का नहीं ( आतिथ्येष्टि सोम राजा के लिए होती है जिसमें सोम लता का शूद्र से क्रय करके उसे बांधकर अतिथि की भांति तब तक प्रतिष्ठित रखा जाता है जब तक घर्म रूपी प्रखर तेज या सूर्य का विकास न हो जाए ) ।

प्रयाज व अनुयाज में अन्तर :     प्रयाजों के पश्चात् अनुयाज कर्म होता है । कहा गया है कि प्राण प्रयाज हैं और छन्द अनुयाज हैं ( शतपथ ब्राह्मण ) । अन्यत्र कहा गया है कि प्राण प्रयाज हैं जबकि अपान अनुयाज हैं ( शांखायन ब्राह्मण ७.१) । अतः प्रयाजों का आह्वान प्राञ्च:, पूर्व दिशा में किया जाता है । अनुयाजों का आह्वान प्रत्यञ्च:, पश्चिम दिशा में किया जाता है ( शतपथ ब्राह्मण ११.२.७.२७) । शांखायन ब्राह्मण १०.३ का कथन है कि रेतः सिञ्चन का कार्य प्रयाजों द्वारा किया जाता है जबकि रेतः धारण का कार्य अनुयाजों द्वारा । प्रयाजों में उपभृत नामक पात्र से आठ बार जुहू नामक पात्र में आज्य ग्रहण किया जाता है और फिर जुहू से ४ बार आहुति दी जाती है । अनुयाज कर्म में उपभृत पात्र से पृषदाज्य( पयः ) की आहुति दी जाती है ( तैत्तिरीय संहिता २.६.१०.४, शतपथ ब्राह्मण ३.८.४.८) । तैत्तिरीय संहिता ६.३.११.६ का कथन है कि पृषदाज्य पशुओं का प्राणापानौ है । तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.३.५.५ में जुहू पात्र में चार बार आज्य ग्रहण करने का कारण यह दिया गया है कि गौ के चार पाद होते हैं तथा उपभृत पात्र में आठ बार आज्य ग्रहण करने का कारण यह है कि वह आठ शफों वाली होती है । प्रयाज कर्म में पूर्ण मन्त्र का उच्चारण किया जाता है जबकि अनुयाज में मन्त्र के केवल प्रतीक का उच्चारण किया जाता है । शतपथ ब्राह्मण ११.२.७.१० के अनुसार दर्शपूर्ण मास इष्टि में त्विषि प्रथम प्रयाज है, अपचिति द्वितीय, यश तृतीय, ब्रह्मवर्चस् चतुर्थ और अन्नाद्य पंचम । इन पांच प्रयाजों की तुलना शतपथ ब्राह्मण १.५.३.१ इत्यादि में मिलने वाले वर्णन से की जा सकती है जहां पांच प्रयाजों का नाम समित्/वसन्त, तनूनपात्/ग्रीष्म, इड/वर्षा, बर्हि/शरद व स्वाहा/हेमन्त आया है। पहले चार प्रयाजों को तो मिथुन कहा गया है (शतपथ ब्राह्मण १.५.४.६) जहां देव और असुर मिलकर काम करते हैं, जबकि पांचवें प्रयाज को केवल देवों का कार्य कहा गया है, वहां मिथुन नहीं है। शतपथ ब्राह्मण ११.२.७.२१ के अनुसार अशनि प्रथम अनुयाज है, ह्रादुनी द्वितीय, उल्कुषी तृतीय ।

          सोमयाग के आरम्भ में प्रायणीय इष्टि का सम्पादन होता है और सोमयाग के अन्त में अवभृथ स्नान के पश्चात् उदयनीय इष्टि का सम्पादन होता है । तैत्तिरीय संहिता ६.१.५.३, ऐतरेय ब्राह्मण १.११ आदि में प्रश्न उठाया गया है कि क्या प्रायणीय इष्टि में केवल प्रयाजों का अनुष्ठान करना चाहिए और उदयनीय में केवल अनुयाजों का ? इसका उत्तर दिया गया है कि ऐसा न करे क्योंकि प्रयाज आत्मा के तुल्य हैं और अनुयाज प्रजा के तुल्य । यदि इनमें से एक का लोप करता है तो वह अभीष्ट नहीं है । इस समस्या के हल के रूप में प्रायणीय की पुरोनुवाक्या को उदयनीय की याज्या बना लिया जाता है ?

          अब प्रयाग के पौराणिक वर्णनों पर आते हैं । कुछ पौराणिक कथाओं का आरम्भ इस प्रकार होता है कि शंखासुर ने सोते हुए ब्रह्मा के वेदों का हरण कर लिया और उन्हें समुद्र में ले गया । तब विष्णु ने मत्स्य रूप धारण करके शंखासुर का वध किया । इस बीच वेद समुद्र के जल में विलीन हो गए । तब विष्णु ने ऋषियों से कहा कि तुम समुद्र से वेदों को एकत्रित करो । तब तक मैं प्रयाग में स्थित होता हूं । ऋषियों ने वेदों को एकत्रित करके विष्णु को प्रस्तुत किया । विष्णु ने कहा कि जिस ऋषि ने वेद के जिस भाग को एकत्र किया है, वह उसी के नाम से प्रसिद्ध होगा । इस कथा में शंखासुर के संदर्भ में, सोमयाग में देवों की स्तुति दो प्रकार से की जाती है - सामवेद के गायन द्वारा और फिर उन्हीं मन्त्रों का उच्चारण ऋग्वेद आदि के ऋत्विजों द्वारा किया जाता है । इसे शंसन कहा जाता है । कहा गया है कि सामवेद के गायन से अमर्त्य स्तर की पुष्टि होती है जबकि शंसन द्वारा मर्त्य स्तर की । ऐसा अनुमान है कि शंसन ही पुराणों का शंख है । ऐसा कहा जा सकता है कि सामवेद या स्तोत्र गान श्रुति से सम्बन्धित है जबकि ऋचा का शंसन श्रुति व स्मृति दोनों से । शंखासुर का तात्पर्य यह हो सकता है कि शंसन से श्रुति के भाग का लोप हो गया है और केवल स्मृति शेष रह गई है । इसे ही लगता है पुराणों में शंखासुर द्वारा वेदों का हरण कहा गया है । वेदों के समुद्र में मिलने का अर्थ यह हो सकता है कि अब ऋचा का ऋचा से भेद नहीं रह गया है । वैदिक साहित्य में विज्ञानमय कोश को भी समुद्र की संज्ञा दी जाती है जहां कोई भी विचार आदि व्याकृत स्थिति में नहीं रहता । सबकी स्थिति समुद्र के जलवत् होती है । शतपथ ब्राह्मण १.३.२.८ में उल्लेख आता है कि प्रयाज कर्म में जो आज्य द्वारा आहुतियां दी जाती हैं, वह अनादिश्य दी जाती हैं - किसी देवता या ऋतु का प्रत्यक्ष रूप में उल्लेख नहीं किया जाता । आज्य हवि की यही विशेषता है । इसके विपरीत सोम की आहुति निर्देश सहित दी जाती है । अतः यह कहा जा सकता है कि प्रयाज कर्म या प्रयाग का आरम्भ अनादिश्य स्थिति से होता है । इस अनादिश्य स्थिति को निर्देश्य स्थिति में बदलना है, ऐसा पौराणिक कथा से प्रतीत होता है । निर्दिष्ट स्थिति में प्रत्येक ऋषि किसी ऋचा का रचयिता बन जाता है । एक पौराणिक कथा में एक दुष्ट व्यक्ति किसी पतिव्रता पत्नी से समागम की कामना करता है और इच्छा पूर्ण न होने पर किसी के परामर्शवश प्रयाग में जाकर इच्छा को मन में रखते हुए प्राणान्त कर लेता है । इससे उसकी इच्छा पूर्ण होती है । इसी प्रकार एक वेश्या की मृत्यु प्रयाग क्षेत्र का जल मुख में धारण करने से होती है और मृत्यु समय में उसकी कामना रहती है कि वह महिषी बने । और उसकी यह कामना पूर्ण होती है ।

          पौराणिक कथाओं में प्रयाग में माघ मास में गंगा - यमुना के संगम स्थान पर स्नान करने के महत्त्व का अतिशयोक्ति पूर्ण वर्णन है । वैदिक साहित्य में तो प्रत्यक्ष रूप में ऐसा कोई वर्णन नहीं आता । लगता है कि प्रयाज और अनुयाज के मिलन को पुराणों में गङ्गा और यमुना के सङ्गम के रूप में प्रतिष्ठित किया गया होगा । गङ्गा मुख्य रूप से ज्ञान का प्रतीक है जबकि यमुना कर्म का । नारद पुराण का कथन है कि प्रयाग में गङ्गा की विशेषता यह है कि वह यहां पश्चिमवाहिनी बन जाती है ( वाराणसी में गङ्गा उत्तरवाहिनी है आदि ) । पश्चिमवाहिनी का अर्थ होगा कि जो गङ्गा केवल ज्ञानप्रद थी, अब वह पापनाशक हो गई है क्योंकि पौराणिक व वैदिक साहित्य में पश्चिम दिशा से तात्पर्य पाप नाश से लिया जाता है । तैत्तिरीय संहिता २.६.१.१ में एक गायत्री के रूप में एक देववर्म/कवच की कल्पना की गई है । इस गायत्री में पांच अक्षर प्राची दिशा के अनुदिश हैं जबकि तीन अक्षर प्रतीची दिशा के अनुदिश हैं ( पांच प्रयाज, तीन अनुयाज ) । प्रायः कहा जाता है कि गौ, गंगा व गायत्री का घनिष्ठ सम्बन्ध है । गंगा - यमुना के संगम के मूल स्रोत की दूसरी संभावना वैदिक साहित्य के तीन पुरों के परस्पर मिलन में निहित हो सकती है ।          ऐतरेय ब्राह्मण १.८ में विभिन्न कामनाओं की पूर्ति के लिए विभिन्न दिशाओं में प्रयाज कर्म करने का निर्देश है । तेज, ब्रह्मवर्चस की इच्छा के लिए पूर्व में, अन्नाद्य की कामना के लिए दक्षिण में, पशुओं की कामना के लिए पश्चिम में, सोमपान की कामना के लिए उत्तर में और स्वर्ग हेतु ऊर्ध्व दिशा में प्रयाज आहुतियों हेतु जाना चाहिए । यह परीक्षणीय है कि क्या प्रयाग से सम्बन्धित पौराणिक कथाओं में इस तथ्य को ध्यान में रखा गया है ? भरद्वाज - पत्नी त्रिवेणी प्रयाग में राम व भरत की सेना को दिव्य अन्न प्रस्तुत करती है । शतपथ ब्राह्मण १३.५.४.११ में एक गाथा का उल्लेख किया गया है :

अष्टासप्ततिं भरतो दौष्यन्तिर्यमुनामनु । गंगायां वृत्रघ्नेऽबध्नात् पंच पंचाशतं हयान् ।।

इसका अर्थ है कि दुष्यन्त - पुत्र भरत ने वृत्रघ्न इन्द्र के लिए यमुना के किनारे ७८ और गंगा के किनारे ५५ अश्वों को बांधा । इस कर्म का उल्लेख विष्णु - क्रम रूपी समष्टि कर्म के पश्चात् व्यष्टि कर्म के रूप में किया गया है । भरत का अर्थ जड प्रकृति में प्राणों का भरण करने वाला, दिव्य आनन्द की सृष्टि करने वाला लिया जा सकता है । प्रयाजों को भी प्राण कहा गया है और वायु पुराण में भी प्रयाग की स्थिति प्राण देश में कही गई है । प्राण अभीप्सा, कामना, ब्रह्माण्ड की शक्तियों को अपने अन्दर भरने की कामना से सम्बन्धित हो सकते हैं । भरद्वाज का अर्थ वाज का, दिव्य अन्न का भरण करने वाला लिया जाता है । लेकिन दूसरी ओर भरद्वाज को मन भी कहा गया है । अतः यह अन्वेषणीय है कि भरद्वाज की विशेष रूप से प्रयाग में प्रतिष्ठा करके रामायण के रचयिता ने किस उद्देश्य की पूर्ति की है ।

          प्रयाग के संदर्भ में पुराणों में माघ मास में प्रयाग में स्नान का विशेष महत्त्व कहा गया है । माघ शब्द मा - अघ, कोई पाप शेष नहीं रह गया हो, वह स्थिति है ।

Dear sir/madam,

I would like to know if there is a sloka/stotram on the Triveni sangam of the acred rivers, and if so how I can get a sung/chanted version which I may use to compose an opening dance item for a dance programme. I look forwrd to your reply

Thanking you in anticipation,

Soorya Gayan(Mrs)

19-4-2014

 

पद्मपुराण 6.22

यमुना --

*दृष्टेन वंदितेनापि स्पृष्टेन च धृतेन के ।

नरा येन विमुच्यंते तदेतद् यामुनं जलम्॥ १४॥

 

के शब्द ध्यान देने योग्य है। यमुना की उत्पत्ति केदारनाथ से होती है। हमारे शिर का कोई भाग ऐसा है जिसका विदारण हो जाता है और वहां से जल बहने लगता है। के को खे, खं कहा जा सकता है। जहां के, खे का दारण हो जाए और जल बहने लगे, वह केदारनाथ हो सकता है।

 

*तावद् भ्रमंति भुवने मनुजा भवोत्थ दारिद्य्र रोग मरण व्यसनाभिभूताः ।

यावज्जलं तव महानदि नीलनीलं पश्यंति नो दधति मूर्धसु सूर्यपुत्रि ॥१५॥

गंगा - -

*यत्संस्मृतिः सपदि कृंतति दुष्कृतौघं पापावलीं जयति योजन लक्षतोऽपि ।

यन्नाम नाम जगदुच्चरितं पुनाति दिष्ट्या हि सा पथिदृशो भविताद्य  गंगा ॥१६॥

*आलोकोत्कंठितेन प्रमुदित मनसा वर्त्म यस्याः प्रयातं सद्यस्मिन्कृत्यमेतामथ प्रथम कृती जज्ञिवान्स्वर्गसिंधुम् ।

स्नानं संध्या निवापः सुर यजनमपि श्राद्ध विप्राशनाद्यं सर्वं संपूर्णमेतत्भवति भगवतः प्रीतिदं नातिचित्रम् ॥१७॥

*देवीभूत परं ब्रह्म परमानंददायिनी ।

अर्घं गृहाण मे गंगे पापं हर नमोस्तुते ॥१८॥

*साक्षाद्धर्म द्रवौघं मुररिपु चरणांभोज पीयूषसारं।

दुःखस्याब्धेस्तरित्रं सुरमनुजनुतं स्वर्गसोपान मार्गम्।

सर्वांहोहारि वारि प्रवर गुणगणंभासि या संवहंती।

तस्यै भागीरथि श्रीमति मुदितमना देवि कुर्वे नमस्ते ॥१९॥

*स्वःसिंधो दुरिताब्धिमग्न जनता संतारणि प्रोल्लसत्कल्लोला।

*मलकांतिनाशिततमस्तोमे जगत्पावनि ।

गंगे देवि पुनीहि दुष्कृतभयक्रांतं कृपाभाजनं मातर्मां शरणागतं शरणदे रक्षाथभोभीषितम् ॥२०॥

*हं हो मानस कंपसे किमु सखे त्रस्तोभयान्नारकात्किं ते

भीतिरिति श्रुतिर्दुरितकृत्संजायते नारकी ।

माभैषीः शृणु मे गतिं यदि मया पापाचल

स्पर्द्धिनी प्राप्ता ते निरयं कथः किमपरं किं मे न धर्मं धनम् ॥२१॥

*सर्वेशादि प्रशंसा मुदमनुभवनं मज्जनं यत्र चोक्तं स्वर्नार्योवीक्ष्यहृष्टा

विबुध सुरपतिः प्राप्तिसंभावनेन ।

नीरे श्रीजह्नु कन्येयम् अनियमरताः स्नांति ये तावकीने।

देवत्वं ते लभंते स्फुटम् अशुभकृतोप्यत्र वेदाः प्रमाणम् ॥२२॥

*बुद्धे सद्बुद्धिरेवं भवतु तव सखे मानस स्वस्तिते ऽस्तु।

आस्तां पादौ पदस्थौ सततमिह युवां साधु दृष्टी च दृष्टी ।

वाणि प्राणप्रियेधि प्रकट गुण वपुः प्राप्नुहि प्राणि पुष्टिं यस्मात्सर्वैर्भवद्भिः।

सुखमतुलमहं प्राप्नुवं तीर्थपुण्यम् ॥२३॥

*श्रीजाह्नवी रविसुता परमेष्ठिपुत्री सिंधुत्रयाभरणतीर्थवर प्रयाग।

सर्वेश मामनुगृहाण नयस्व चोर्ध्वमंतस्तमो दशविधं दलय स्वधाम्ना ॥२४॥

 

उपरोक्त श्लोक में तीन नदियों को प्रयाग तीर्थ के सिन्धुत्रय रूप आभरण, आभूषण कहा जा रहा है। प्रयाग और त्रिवेणी का क्या सम्बन्ध है। प्रयाग पुरुष है और त्रिवेणी प्रकृति। प्रकृति से यह अपेक्षा की जाती है कि वह धारा रूप हो, अक्ष रूप, द्यूत रूप न हो। जहां धारा रूप होगा, वहां प्रकृति की घटनाओं का द्यूत रूप में, चांस रूप में घटित होना समाप्त हो जाएगा। यह तीन धाराएं कौन सी हैं, यह विचारणीय है। ज्ञान, क्रिया और भावना को तीन धाराएं कह सकते हैं। त्रिवेणी शब्द की व्याख्या का प्रयास वेणु शब्द के आधार पर भी किया जा सकता है। वेणु को बजाने के लिए उसमें प्राण फूंकने पडते हैं। इसका अर्थ हुआ कि यदि हम जड तत्त्व को चेतन बनाना चाहते हैं, जड तत्त्व में प्राणों का संचार करना चाहते हैं तो प्रयाग उसके लिए उपयुक्त स्थान है। प्रयाग में चेतन तत्त्व के तीन गुण – ज्ञान, क्रिया और भावना धारा रूप में उपलब्ध हो जाएंगे। इनके समकक्ष प्रयाग का रूप मन, प्राण व वाक् होना चाहिए। इनका भौतिक रूप चन्द्रमा, सूर्य व पृथिवी हैं। इन तीनों के मिलने से संध्या, मास, संवत्सर आदि का प्रादुर्भाव होता है। प्रयाग में विशेष रूप से प्राणों की स्थिति, बृहत् रूप में सूर्य की स्थिति कही गई है। प्रयाग को मध्यम वेदी नाम दिया गया है। मध्यम का अर्थ होता है जहां पापों का नाश कर दिया गया है लेकिन अभी उसका लाभ नहीं उठाया गया है अथवा समाज को उस स्थिति से लाभान्वित नहीं किया गया है। यह वामन बनने की स्थिति है। वामन से आगे विराट बनने की स्थिति आती है। यह प्रयाग के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है।

*वागीश विष्ण्वीश पुरंदराद्याः पापप्रणाशाय विदांविदोऽपि।

भजंति यत्तीरमनीलनीलं सतीर्थराजो जयति प्रयागः ॥२५॥

*कलिंदजा संगम वाप्ययत्र प्रत्यग्गता स्वर्गधुनीधुनोति।

अध्यात्म तापत्रितयं जनस्य स तीर्थराजो जयति प्रयागः ॥२६॥

*श्यामो वटः श्यामगुणोवृणोति स्वच्छायया श्यामल याजनानाम्।

श्यामश्रमं कृंतति यत्रदृष्टः स तीर्थराजो जयति प्रयागः ॥२७॥

*ब्रह्मादयोप्यात्मकृतिं विहाय भजंति पुण्यात्मक भागधेयम् ।

यत्रोज्झितादंडधरः स्वदंडं स तीर्थराजो जयति प्रयागः ॥२८॥

*यत्सेवया देव नृदेवतादि देवर्षयः प्रत्यहमामनंति।

स्वर्गं च सर्वोत्तम भूमिराज्यं स तीर्थराजो जयति प्रयागः ॥२९॥

*एनांसि हंतीति प्रसिद्धवार्ता नाम प्रतापेन दृशो भवंति।

यस्य त्रिलोकीं प्रतताप गोभिः स तीर्थराजो जयति प्रयागः ॥३०॥

*धत्ते ऽभितश्चामर चारुकांतिं सितासिते यत्रसरिद्वरेण्ये ।

आद्यो वटश्छत्रमिवातिभाति स तीर्थराजो जयति प्रयागः ॥३१॥

*ब्राह्मीनपुत्री त्रिपथास्त्रिवेणी समागमे साक्षतयागमात्रात् ।

यत्राप्नुतान्ब्रह्मपदं नयंति स तीर्थराजो जयति प्रयागः॥ ३२॥

*केषांचिज्जन्मकोटिर्व्रजति सुवचसां यामियामीति यस्मिन्केषां।

चित्प्रेप्सतां यं नियतमतियतेद् वर्षवृंदं वरिष्ठम्।

यत्प्राप्तं भाग्यलक्षैर्भवति भवति नो वास वाचामवाच्यो।

दिष्ट्या वेणी विशिष्टो भवति दृगतिथिः कं प्रयाग प्रयागः ॥३३॥

*लोकानामक्षमाणां मखकृतिषु कलौ स्वर्गकामैर्जय स्तुत्यादि स्तोत्रैर्वचोभिः।

कथममरपद प्राप्ति चिंतातुराणाम् ।

अग्निष्टोमाश्वमेध प्रमुख मखफलं सम्यगालोच्यसांगं।

ब्रह्माद्यैस्तीर्थराजो ऽभिमतद उपदिष्टो ऽयमेव प्रयागः ॥३४॥

*मया प्रमादातुरतादि दोषतः संध्या विधिर्नो समुपासितोऽभूत्।

चेदत्र संध्यां चरते प्रसादतः संध्यास्तु पूर्णा ऽखिलजन्मनोऽपि मे ॥३५॥

*अन्यत्रापि प्रगर्जन्महिमनि तपसि प्रेमभिर्विप्रकृष्टैर्ध्यातः।

संकीर्तितो योऽभिमत पद विधातानिशं निर्व्यपेक्षंम् ।

श्रीमत्पांशुं त्रिवेणीपरिवृढम् अतुलं तीर्थराजं प्रयागं गोलंकारप्रकाशं स्वयममरवरं चेतनं तं नमामि ॥३६॥

 

प्रयाग को प्रयाग नाम क्यों दिया गया है, इस सम्बन्ध में अनुमान है कि वैदिक कर्मकाण्ड में सोमयाग में प्रयाज और अनुयाज कर्म होते हैं। प्राणों को प्रयाज और छन्दों को अनुयाज कहा गया है। अपने भीतर जड तत्त्व को सजीव बनाना प्रयाज या प्रयाग हो सकता है। और प्रकृति का उपयोग अधिकतम दक्षता के साथ करना, उसे छन्दोबद्ध बनाना अनुयाज हो सकता है। अनुयाज त्रिवेणी स्थिति का रूप हो सकता है।

 

 

 

 

प्रयाज

संदर्भ

ऋचा प्रयाजेषु यजति प्रतीकैरनुयाजेषु – कौशीतकि ब्रा. 10.2-5

एकादश प्रयाजाः – काठ.सं. 26.9, कपि.क.सं. 41.7

नव प्रयाजाः – मै.सं. 1.10.8

१.५.३.[१]

 

ऋतवो ह वै प्रयाजाः । तस्मात्पञ्च भवन्ति पञ्च ह्यृतवः

 

 

 

१.५.३.[२]

 

देवाश्च वा असुराश्च । उभये प्राजापत्याः पस्पृधिर एतस्मिन्यज्ञे प्रजापतौ पितरि संवत्सरेऽस्माकमयं भविष्यत्यस्माकमयं भविष्यतीति

 

 

 

१.५.३.[३]

 

ततो देवाः । अर्चन्तः श्राम्यन्तश्चेरुरस्त एतान्प्रयाजान्ददृशुस्तैरयजन्त

तैर्ऋतून्त्संवत्सरं प्राजयन्नृतुभ्यः संवत्सरात्सपत्नानन्तरायंस्तस्मात्प्रजयाः

प्रजया ह वै नामैतद्यत्प्रयाजा इति तथो एवैष एतैर्ऋतून्त्संवत्सरम्

प्रयजत्यृतुभ्यः संवत्सरात्सपत्नानन्तरेति तस्मात्प्रयाजैर्यजते

 

 

 

१.५.३.[४]

 

ते वा आज्यहविषो भवन्ति । वज्रो वा आज्यमेतेन वै देवा वज्रेणाज्येनर्तून्त्संवत्सरं प्राजयन्नृतुभ्यः संवत्सरात्सपत्नानन्तरायंस्तथो एवैष एतेन वज्रेणाज्येनर्तून्त्संवत्सरं प्रजयत्यृतुभ्यः संवत्सरात्सपत्नानन्तरेति तस्मादाज्यहविषो भवन्ति

 

 

 

१.५.३.[५]

 

एतद्वै संवत्सरस्य स्वं पयः । यदाज्यं तत्स्वेनैवैनमेतत्पयसा देवाः स्व्यकुर्वत तथो एवैनमेष एतत्स्वेनैव पयसा स्वीकुरुते तस्मादाज्यहविषो भवन्ति

 

 

 

१.५.३.[६]

 

स यत्रैव तिष्ठन्प्रयाजेभ्य आश्रावयेत् । तत एव नापक्रामेत्संग्रामो वा एष संनिधीयते यः प्रयाजैर्यजते यतरो वै संयत्तयोः पराजयतेऽप वै संक्रामत्यभितरामु वै जयङ्क्रामति तस्मादभितरामभितरामेव क्रामेदभितरामभितरामाहुतीर्जुहुयात्

 

 

 

१.५.३.[७]

 

तदु तथा न कुर्यात् । यत्रैव तिष्ठन्प्रयाजेभ्य आश्रावयेत्तत एव नापक्रामेद्यत्रो एव समिद्धतमं मन्येत तदाहुतीर्जुहुयात्समिद्धहोमेन ह्येव समृद्धा आहुतयः

 

 

 

१.५.३.[८]

 

स आश्राव्याह । समिधो यजेति तद्वसन्तं समिन्द्धे स वसन्तः समिद्धो ऽन्यानृतून्त्समिन्द्ध ऋतवः समिद्धाः प्रजाश्च प्रजनयन्त्योषधीश्च पचन्ति तद्वेव खलु सर्वानृतून्निराहाथ यजयजेत्येवोत्तरानाहाजामितायै जामि ह कुर्याद्यत्तनूनपातं यजेडो यजेति ब्रूयात्तस्माद्यजयजेत्येवोत्तरानाह

 

 

प्रयाजब्राह्मणम्

१.५.३.[९]

 

स वै समिधो यजति । वसन्तो वै समिद्वसन्तमेव तद्देवा अवृञ्जत वसन्तात्सपत्नानन्तरायन्वसन्तमेवैष एतद्वृङ्क्ते वसन्तात्सपत्नानन्तरेति तस्मात्समिधो यजति

 

 

 

१.५.३.[१०]

 

अथ तनूनपातं यजति । ग्रीष्मो वै तनूनपाद्ग्रीष्मो ह्यासां प्रजानां तनूस्तपति

ग्रीष्ममेव तद्देवा अवृञ्जत ग्रीष्मात्सपत्नानन्तरायङ्ग्रीष्ममेवैष एतद्वृङ्क्ते ग्रीष्मात्सपत्नानन्तरेति तस्मात्तनूनपातं यजति

 

 

 

१.५.३.[११]

 

अथेडो यजति । वर्षा वा इड इति हि वर्षा इडो यदिदं क्षुद्रं सरीसृपं ग्रीष्महेमन्ताभ्यां नित्यक्तं भवति तद्वर्षा ईडितमिवान्नमिच्छमानं चरति तस्माद्वर्षा इडो वर्षा एव तद्देवा अवृञ्जत वर्षाभ्यः सपत्नानन्तरायन्वर्षा उ एवैष एतद्वृङ्क्ते वर्षाभ्यः सपत्नानन्तरेति तस्मादिडो यजति

 

 

 

१.५.३.[१२]

 

अथ बर्हिर्यजति । शरद्वै बर्हिरिति हि शरद्बर्हिर्या इमाओषधयो ग्रीष्महेमन्ताभ्यां नित्यक्ता भवन्ति ता वर्षा वर्धन्ते ताः शरदि बर्हिषो रूपं प्रस्तीर्णाः शेरे तस्माच्छरद्बर्हिः शरदमेव तद्देवा अवृञ्जत शरदः सपत्नान्तरायञ्छरदमेवैष एतद्वृङ्क्ते शरदः सपत्नानन्तरेति तस्माद्बर्हिर्यजति

 

 

१.५.३.[१३]

 

अथ स्वाहास्वाहेति यजति । अन्तो वै यज्ञस्य स्वाहाकारोऽन्त ऋतूनां हेमन्तो

वसन्ताद्धि परार्द्ध्योऽन्तेनैव तदन्तं देवा अवृञ्जतान्तेनान्तात्सपत्नानन्तरायन्नन्तेनो एवैष एतदन्तं वृङ्क्ते ऽन्तेनान्तात्सपत्नानन्तरेति तस्मात्स्वाहेति यजति

 

 

 

१.५.३.[१४]

 

तद्वा एतत् । वसन्त एव हेमन्तात्पुनरसुरेतस्माद्ध्येष पुनर्भवति पुनर्ह वा अस्मिंलोके भवति य एवमेतद्वेद

 

 

 

१.५.३.[१५]

 

स वै व्यन्तु वेत्विति यजति । अजामितायै जामि ह कुर्याद्यद्व्यन्तुव्यन्त्विति वैव यजेद्वेतुवेत्त्विति वा व्यन्त्विति वै योषा वेत्विति वृषा मिथुनमेवैतत्प्रजननं क्रियते तस्माद्व्यन्तु वेत्विति यजति

 

 

 

१.५.३.[१६]

 

अथ चतुर्थे प्रयाजे समानयति बर्हिषि । प्रजा वै बर्ही रेत आज्यं तत्प्रजास्वेवैतद्रेतः सिच्यते तेन रेतसा सिक्तेनेमाः प्रजाः पुनरभ्यावर्तम् प्रजायन्ते तस्माच्चतुर्थेप्रयाजे समानयति बर्हिषि

 

 

 

१.५.३.[१७]

 

संग्रामो वा एष संनिधीयते । यः प्रयाजैर्यजते यतरं वै संयत्तयोर्मित्रमागच्छति स जयति तदेतदुपभृतोऽधि जुहूं मित्रमागच्छति तेन प्रजयति तस्माच्चतुर्थे प्रयाजे समानयति बर्हिषि

 

 

 

१.५.३.[१८]

 

यजमान एव जुहूमनु । यो ऽस्मा अरातीयति स उपभृतमनुयजमानायैवैतद्द्विषन्तं भ्रातृव्यं बलिं हारयत्यत्तैव जुहूमन्वाद्य उपभृतमन्वत्त्र एवैतदाद्यं बलिं हारयति तस्माच्चतुर्थे प्रयाजे समानयति

 

 

 

१.५.३.[१९]

 

स वा अनवमृशन्त्समानयति । स यद्धावमृषेद्यजमानं  द्विषता भ्रातृव्येनावमृशेदत्तारमाद्येनावमृशेत्तस्मादनवमृशन्त्समानयति

 

 

१.५.३.[२०]

 

अथोत्तरां जुहूमध्यूहति । यजमानमेवैतद्विषति भ्रातृव्येऽध्यूहत्यत्तारमाद्ये ऽध्यूहति तस्मादुत्तरां जुहूमध्यूहति

 

 

 

१.५.३[.२१]

 

देवा ह वा ऊचुः । हन्त विजितमेवानु सर्वं यज्ञं संस्थापयाम यदि नो ऽसुररक्षसान्यासजेयुः संस्थित एव नो यज्ञं स्यादिति

 

 

 

१.५.३.[२२]

 

त उत्तमे प्रयाजे । स्वाहाकारेणैव सर्वं यज्ञं समस्थापयन्त्स्वाहाग्निमिति तदाग्नेयमाज्यभागं समस्थापयन्त्स्वाहा सोममिति तत्सौम्यमाज्यभागं समस्थापयन्त्स्वाहाग्निमिति तद्य एष उभयत्राच्युत आग्नेयः पुरोडाशो भवति तं समस्थापयन्

 

 

 

१.५.३.[२३]

 

अथ यथादेवतम् । स्वाहा देवा आज्यपा इति तत्प्रयाजानुयाजान्त्समस्थापयन्प्रयाजानुयाजा वै देवा आज्यपा जुषाणो अग्निराज्यस्य वेत्विति तदग्निं स्विष्टकृतं समस्थापयन्नग्निर्हि स्विष्टकृत्स एषोऽप्येतर्हि तथैव यज्ञं संतिष्ठते यथैवैनं देवाः समस्थापयंस्तस्मादुत्तमे प्रयाजे स्वाहास्वाहेति यजति यावन्ति हवींषि भवन्ति विजितमेवैतदनु सर्वं यज्ञं संस्थापयति तस्माद्यदत ऊर्ध्वं विलोम यज्ञे क्रियेत न तदाद्रियेत संस्थितो मे यज्ञ इति ह विद्यात्स हैष यज्ञो यातयामेवास यथा वषट्कृतं हुतं स्वाहाकृतं

 

 

 

१.५.३.[२४]

 

ते देवा अकामयन्त । कथं न्विमं यज्ञं पुनराप्याययेमायातयामानं कुर्याम तेनायातयाम्ना प्रचरेमेति

 

 

 

१.५.३.[२५]

 

स यज्जुह्वामाज्यं परिशिष्टमासीत् । येन यज्ञं समस्थापयंस्तेनैव यथापूर्वं हवींष्यभ्यघारयन्पुनरेवैनानि तदाप्याययन्नयातयामान्यकुर्वन्नयातयाम ह्याज्यं तस्मादुत्तमं प्रयाजमिष्ट्वा यथापूर्वं हवींष्यभिघारयति पुनरेवैनानि तदाप्याययत्ययातयामानि करोत्ययातयाम ह्याज्यं तस्माद्यस्य कस्य च हविषोऽवद्यति पुनरेव तदभिघारयति स्विष्टकृत एव तत्पुनराप्यायत्ययातयाम करोत्यथ यदा स्विष्टकृतेऽवद्यति न ततः पुनरभिघारयति नो हि ततः कां चन हविषोऽग्नावाहुतिं होष्यन्भवति

 

 

१.५.४प्रयाजावृत्

१.५.४.[१]

 

स वै समिधो यजति । प्राणा वै समिधः प्राणानेवैतत्समिन्द्धे प्राणैर्ह्ययम् पुरुषः समिद्धस्तस्मादभिमृषेति ब्रूयाद्यद्युपतापी स्यात्स यद्युष्णः स्यादैव तावच्छंसेत समिद्धो हि स तावद्भवति यद्यु शीतः स्यान्नाशंसेत तत्प्राणानेवास्मिन्नेतद्दधाति तस्मात्समिधो यजति

 

 

 

१.५.४.[२]

 

अथ तनूनपातं यजति । रेतो वै तनूनपाद्रेत एवैतत्सिञ्चति तस्मात्तनूनपातं

यजति

 

 

 

१.५.४.[३]

 

अथेडो यजति । प्रजा वा इडो यदा वै रेतः सिक्तं प्रजायतेऽथ तदीडितमिवान्नमिच्छमानं चरति तत्प्रैवैतज्जनयति तस्मादिडो यजति

 

 

१.५.४.[४]

 

अथ बर्हिर्यजति । भूमा वै बर्हिर्भूमानमेवैतत्प्रजनयति तस्माद्बर्हिर्यजति

 

 

१.५.४.[५]

 

अथ स्वाहास्वाहेति यजति । हेमन्तो वा ऋतूनां स्वाहाकारो हेमन्तो हीमाः प्रजाः स्वं वशमुपनयते तस्माद्धेमन्म्लायन्त्योषधयः प्र वनस्पतीनां पलाशानि

मुच्यन्ते प्रतितिरामिव वयांसि भवन्त्यधस्तरामिव वयांसि पतन्ति विपतितलोमेव पापः पुरुषो भवति हेमन्तो हीमाः प्रजाः स्वं वशमुपनयते स्वी ह वै तमर्धं कुरुते श्रियेऽन्नाद्याय यस्मिन्नर्धे भवति य एवमेतद्वेद

 

 

 

१.५.४.[६]

 

देवाश्च वा असुराश्च । उभये प्राजापत्याः पस्पृधिरे ते दण्डैर्धनुर्भिर्न व्यजयन्त ते हाविजयमाना ऊचुर्हन्त वाच्येव ब्रह्मन्विजिगीषामहै स यो नो वाचं व्याहृतां मिथुनेन नानुनिक्रामात्स सर्वं पराजयाता अथ सर्वमितरे जयानिति तथेति देवा अब्रुवंस्ते देवा इन्द्रमब्रुवन्व्याहरेति

 

 

 

१.५.४.[७]

 

स इन्द्रोऽब्रवीत् । एको ममेत्यथास्माकमेकेतीतरेऽब्रुवंस्तदु तन्मिथुनमेवाविन्दन्मिथुनं ह्येकश्चैका च

 

 

 

१.५.४.[८]

 

द्वौ ममेतीन्द्रोऽब्रवीत् । अथास्माकं द्वे इतीतरेऽब्रुवंस्तदु तन्मिथुनमेवाविन्दन्मिथुनंहि द्वौ च द्वे च

 

 

 

१.५.४.[९]

 

त्रयो ममेतीन्द्रोऽब्रवीत् । अथास्माकं तिस्र इतीतरेऽब्रुवंस्तदु तन्मिथुनमेवाविन्दन्मिथुनं हि त्रयश्च तिस्रश्च

 

 

 

१.५.४.[१०]

 

चत्वारो ममेतीन्द्रोऽब्रवीत् । अथास्माकं चतस्र इतीतरेऽब्रुवंस्तदु तन्मिथुनमेवाविन्दन्मिथुनं हि चत्वारश्च चतस्रश्च

 

 

 

१.५.४.[११]

 

पञ्च ममेतीन्द्रोऽब्रवीत् । तत इतरे मिथुनं नाविन्दन्नो ह् यत ऊर्ध्वं मिथुनमस्ति पञ्च पञ्चेति ह्येवैतदुभयम् भवति ततोऽसुराः सर्वं पराजयन्त सर्वस्माद्देवा असुरानजयन्त्सर्वस्मात्सपत्नानसुरान्निरभजन्

 

 

 

१.५.४.[१२]

 

तस्मात्प्रथमे प्रयाज इष्टे ब्रूयात् । एको ममेत्येका तस्य यमहं द्वेष्मीति यद्यु न द्विष्याद्योऽस्मान्द्वेष्टि यं च वयं द्विष्म इति ब्रूयात्

 

 

 

१.५.४.[१३]

 

द्वौ ममेति द्वितीये प्रयाजे । द्वे तस्य योऽस्मान्द्वेष्टि यं च वयं द्विष्म इति

 

 

 

१.५.४.[१४]

 

त्रयो ममेति तृतीये प्रयाजे । तिस्रस्तस्य योऽस्मान्द्वेष्टि यं च वयं द्विष्म इति

 

 

 

१.५.४.[१५]

 

चत्वारो ममेति चतुर्थे प्रयाजे । चतस्रस्तस्य योऽस्मान्द्वेष्टि यंच वयं द्विष्म

इति

 

 

१.५.४.[१६]

 

पञ्च ममेति पञ्चमे प्रयाजे । न तस्य किं चन योऽस्मान्द्वेष्टि यं च वयं

द्विष्म इति स पञ्च पञ्चेत्येव भवन्पराभवति तथास्य सर्वं संवृङ्क्ते सर्वस्मात्सपत्नान्निर्भजति य एवमेतद्वेद

 

 

 

१.६.१प्रयाजानामिष्टौ प्राथम्यम्

१.६.१.[१]

 

ऋतवो ह वै देवेषु यज्ञे भागमीषिरे । आ नो यज्ञे भजत मा नो यज्ञादन्तर्गतास्त्वेव नोऽपि यज्ञे भाग इति

 

 

 

१.६.१.[२]

 

तद्वै देवा न जज्ञुः । त ऋतवो देवेष्वजानत्स्वसुरानुपावर्तन्ताप्रियान्देवानां

द्विषतो भ्रातृव्यान्

 

 

 

१.६.१.[३]

 

ते हैतामेधतुमेधां चक्रिरे । यामेषामेतामनुशृण्वन्ति कृषन्तो ह स्मैव पूर्वे वपन्तो यन्ति लुनन्तोऽपरे मृणन्तः शश्वद्धैभ्योऽकृष्टपच्या एवौषधयः पेचिरे

 

 

 

१.६.१.[४]

 

तद्वै देवानामाग आस । कनीय इन्न्वतो द्विषन्द्विषतेऽरातीयति किम्वेतावन्मात्रमुपजानीत यथेदमितोऽन्यथासदिति

 

 

 

१.६.१.[५]

 

ते होचुः ऋतूनेवानुमन्त्रयामहा इति केनेति प्रथमानेवैनान्यज्ञे यजामेति

 

 

 

१.६.१.[६]

 

स हाग्निरुवाच । अथ यन्मां पुरा प्रथमं यजथ क्वाहं भवानीति न त्वामायतनाच्च्यावयाम इति ते यदृतूनभिह्वयमाना अथाग्निमायतनान्नाच्यावयंस्तस्मादग्निरच्युतो न ह वा आयतनाच्च्यवते यस्मिन्नायतने भवति य एवमेतमग्निमच्युतं वेद

 

 

 

१.६.१.[७]

 

ते देवा अग्निमब्रुवन् परेह्येनांस्त्वमेवानुमन्त्रयस्वेति स हेत्याग्निरुवाचऽर्तेवो

ऽविदं वै वो देवेषु यज्ञे भागमिति कथं नोऽविद इति प्रथमानेव वो यज्ञे यक्ष्यन्तीति

 

 

 

१.६.१.[८]

 

त ऋतवोऽग्निमब्रुवन् । आ वयं त्वामस्मासु भजामो यो नो देवेषु यज्ञे भागमविद इति स एषोऽग्निर्ऋतुष्वाभक्तः समिधो अग्ने तनूनपादग्न इडो अग्ने बर्हिरग्ने स्वाहाग्निमित्याभक्तो ह वै तस्यां पुण्यकृत्यायां भवति यामस्य समानोब्रुवाणः करोत्यग्निमते ह वा अस्मा अग्निमन्त ऋतव ओषधीः पचन्तीदं सर्वं य एवमेतमग्निमृतुष्वाभक्तं वेद

 

 

 

१.६.१.[९]

 

तदाहुः । यदुत्तमान्प्रयाजानावाहयन्त्यथ कस्मादेनान्प्रथमान्यजन्तीति उत्तमान्ह्येनान्यज्ञेऽवाकल्पयन्प्रथमान्वो यजामेत्यब्रुवंस्तस्मादुत्तमानावाहयन्ति प्रथमान्यजन्ति

 

 

 

१.६.१.[१०]

 

चतुर्थेन वै प्रयाजेन देवाः । यज्ञमाप्नुवंस्तं पञ्चमेन समस्थापयन्नथ यदत ऊर्ध्वमसंस्थितं यज्ञस्य स्वर्गमेव तेन लोकं समाश्नुवत

 

 

 

१.६.१.[११]

 

ते स्वर्गं लोकं यन्तः । असुररक्षसेभ्य आसङ्गाद्बिभयां चक्रुस्तेऽग्निम् पुरस्तादकुर्वत रक्षोहणं रक्षसामपहन्तारमग्निं मध्यतोऽकुर्वत रक्षोहणं रक्षसामपहन्तारमग्निं पश्चादकुर्वत रक्षोहणं रक्षसामपहन्तारं

 

 

 

१.६.१.[१२]

 

स यद्येनान्पुरस्तात् । असुररक्षसान्यासिसंक्षन्नग्निरेव तान्यपाहन्रक्षोहा रक्षसामपहन्ता यदि मध्यत आसिसंक्षन्नग्निरेव तान्यपाहन्रक्षोहा रक्षसामपहन्ता यदि पश्चादासिसंक्षन्नग्निरेव तान्यपाहन्रक्षोहा रक्षसामपहन्तात एवं सर्वतोऽग्निभिर्गुप्यमानाः स्वर्गं लोकं समाश्नुवत

 

 

 

१.६.१.[१३]

 

तथो एवैष एतत् । चतुर्थेनैव प्रयाजेन यज्ञमाप्नोति तं पञ्चमेन संस्थापयत्यथ यदत ऊर्ध्वमसंस्थितं यज्ञस्य स्वर्गमेव तेन लोकं समश्नुते

 

 

 

१.६.१.[१४]

 

स यदाग्नेयमाज्यभागं यजति । अग्निमेवैतत्पुरस्तात्कुरुते रक्षोहणं रक्षसामपहन्तारमथ यदाग्नेयः पुरोडाशो भवत्यग्निमेवैतन्मध्यतः कुरुते रक्षोहणं रक्षसामपहन्तारमथ यदग्निं स्विष्टकृतं यजत्यग्निमेवैतत्पश्चात्कुरुते रक्षोहणं रक्षसामपहन्तारं

 

 

 

१.६.१.[१५]

 

स यद्येनं पुरस्तात् । असुररक्षसान्यासिसंक्षन्त्याग्नेरेव तान्यपहन्ति रक्षोहा रक्षसामपहन्ता यदि मध्यत असुररक्षसान्यासिसंक्षन्त्यग्निरेव तान्यपहन्ति रक्षोहा रक्षसामपहन्ता यदि पश्चादसुररक्षसान्यासिसंक्षन्त्यग्निरेव तान्यपहन्ति रक्षोहा रक्षसामपहन्ता स एवं सर्वतोऽग्निभिर्गुप्यमानः स्वर्गं लोकं समश्नुते

 

 

 

१.६.१.[१६]

 

स यद्येनं पुरस्तात् । यज्ञस्यानुव्याहरेत्तं प्रति ब्रूयान्मुख्यामार्त्तिमारिष्यस्यन्धो वा बधिरो वा भविष्यसीत्येता वै मुख्या आर्त्तयस्तथा हैव स्यात्

 

 

 

१.६.१.[१७]

 

यदि मध्यतो यज्ञस्यानुव्याहरेत् । तं प्रति ब्रूयादप्रजा अपशुर्भविष्यसीति प्रजा

वै पशवो मध्यं तथा हैव स्यात्

 

 

 

१.६.१.[१८]

 

यद्यन्ततो यज्ञस्यानुव्याहरेत् । तं प्रति ब्रूयादप्रतिष्ठितो दरिद्रः क्षिप्रेऽमुं लोकमेष्यसीति तथा हैव स्यात्तस्मादुह नानुव्याहारीव स्यादुत ह्येवंवित्परो भवति

 

 

 

१.६.१.[१९]

 

संवत्सरं ह वै प्रयाजैर्जयञ्जयति । स ह न्वेवैनं जयति योऽस्य द्वाराणि वेद

किं हि स तैर्गृहैः कुर्याद्यानन्तरतो न व्यवविद्याद्यथास्य ते भवन्ति तस्य वसन्त एव द्वारं हेमन्तो द्वारं तं वा एतं संवत्सरं स्वर्गं लोकम् प्रपद्यते सर्वं वै संवत्सरः सर्वं वा अक्षय्यमेतेन हास्याक्षय्यं सुकृतम् भवत्यक्षय्यो लोकः

 

 

१.६.१.[२०]

 

तदाहुः । किंदेवत्यान्याज्यानीति प्राजापत्यानीति ह ब्रूयादनिरुक्तो वै प्रजापतिरनिरुक्तान्याज्यानि तानि हैतानि यजमानदेवत्यान्येव यजमानो ह्येव स्वे यज्ञे प्रजापतिरेतेन ह्युक्ता ऋत्विजस्तन्वते तं जनयन्ति

 

 

 

१.६.१.[२१]

 

स आज्यस्योपस्तीर्य । द्विर्हविषोऽवदायाथोपरिष्टादाज्यस्याभिघारयति सैषाज्येन मिश्राहुतिर्हूयते यजमानेन हैवैषैतन्मिश्रा हूयते यदि ह वा अपि दूरे सन्यजते यद्यन्तिके यथा हैवान्ते सत इष्टं स्यादेवं हैवैवं विदुष इष्टं भवति

यद्यु हापि बह्विव पापं करोति नो हैव बहिर्धा यज्ञाद्भवति य एवमेतद्वेद

११.२.६.[४]

 

पञ्च प्रयाजाः  इम एवास्य ते शीर्षण्याः पञ्च प्राणा मुखमेवास्य प्रथमः प्रयाजो दक्षिणा नासिका द्वितीयः सव्या नासिका तृतीयो दक्षिणः कर्णश्चतुर्थः सव्यः कर्णः पञ्चमोऽथ यच्चतुर्थे प्रयाजे समानयति तस्मादिदं श्रोत्रमन्तरतः

संतृण्णं चक्षुषी आज्यभागौ स विद्याच्चक्षुषी एव म एताविति

११.२.७.[२७]

 

प्राणा वै प्रयाजाः  अपाना अनुयाजास्तस्मात्प्रयाजाः प्राञ्चो हूयन्ते तद्धि

प्राणरूपम् प्रत्यञ्चोऽनुयाजास्तदपानरूपमेता ह वै दर्शपूर्णमासयोरुपसदो

यदनुयाजास्तस्मात्त उपसद्रूपेण प्रत्यञ्चो हूयन्ते

१४.२.२.[५१]

 

तदाहुः  यत्प्रयाजानुयाजा अन्यत्र भवन्त्यथ कस्मादत्र न भवन्तीति प्राणा वै

प्रयाजानुयाजाः प्राणा अवकाशाः प्राणाः शाकल  नेत्प्राणैः प्राणानभ्यारोहयाणीति – मा.श. 14.2.2.51

यस्तेजो ब्रह्मवर्चमिच्छेत्प्रयाजाहुतिभिः प्राङ् स इयात्तेजोवै ब्रह्मवर्चसं प्राची दिक्। तेजस्वी ब्रह्मवर्चसी भवति य एवं विद्वान्प्राङेति। यो ऽन्नाद्यमिच्छेत्प्रयाजाहुतिभिर्दक्षिणा स इयादन्नादो वा एषो ऽन्नपतिर्यदग्निः। अन्नादो ऽन्नपतिर्भवत्यश्नुते प्रजया ऽन्नाद्यं य एवं विद्वान्दक्षिणैति। यः पशूनिच्छेत्प्रयाजाहुतिभिः प्रत्यङ् स इयात्पशवो वा एते यदापः। पशुमान्भवति य एवं विद्वान्प्रत्यङ्ङेति। यः सोमपीथमिच्छेत्प्रयाजाहुतिभिरुदङ् स इयादुत्तरा ह वै सोमो राजा। प्र सोमपीथमाप्नोति य एवं विद्वानुदङ्ङेति। स्वर्ग्यैवोर्ध्वा दिक्सर्वासु दिक्सर्वासु दिक्षु राध्नोति। सम्यञ्चो वा इमे लोकाः सम्यञ्चो ऽस्मा इमे लोकाः श्रियै दीद्यति य एवं वेद। पथ्यां यजति यत्पथ्यां यजति वाचमेव तद्यज्ञमुखे संभरति। प्राणापानावग्नीषोमौ प्रसवाय सविता प्रतिष्ठित्या अदितिः। पथ्यामेव यजति यत्पथ्यामेव यजति वाचैव तद्यज्ञं पन्थामपि नयति। चक्षुषी एवाग्नीषोमौ प्रसवाय सविता प्रतिष्ठित्या अदितिः। चक्षुषा वै देवा यज्ञं प्राजानंश्चक्षुषा वा एतत्प्रज्ञायते यदप्रज्ञेयं तस्मादपि मुग्धश्चरित्वा यदैवानुष्ठ्या चक्षुषा प्रजानात्यथ प्रजानाति। यद्वै तद्देवा यज्ञं प्राजानन्नस्या वाव तत्प्राजानन्नस्यां समभरन्नस्यै वै यज्ञस्तायते ऽस्यै क्रियते ऽस्यै संभ्रियत इयं ह्यदितिस्यतदुत्तमामदितिं यजति यदुत्तमामदितिं यजति यज्ञस्य प्रज्ञात्यै स्वर्गस्य लोकस्यानुख्यात्यै॥1.8॥ - ऐ.ब्रा. 1.8

म्प्रयाजानेवात्र यजन्ति नानुयाजान्प्राणा वै प्रयाजानु-याजास्ते य इमे शीर्षन्प्राणास्ते प्रयाजा येऽवाञ्चस्तेऽनुयाजाः स योऽत्रानुया-जान्यजेद्यथेमान्प्राणानालुप्य शीर्षन्धित्सेत्तादृक्तदतिरिक्तं तत्समु वा इमे प्राणा विद्रे ये चेमे ये चेमे तद्यदेवात्र प्रयाजान्यजन्ति नानुयाजांस्तत्र स काम उपाप्तो योऽनुयाजेषु॥1.17॥ - ऐ.ब्रा. 1.17

प्राणा वै प्रयाजाः – काठ.सं. 12.2, 26.9, कौ.ब्रा. 7.1, 10.3

यज्ञमुखं वै प्रयाजाः - - - वीर्यं वै प्रयाजाः – मै.सं. 1.7.3, काठ.सं. 9.1

यद्दश प्रयाजाः, प्राणानेवास्य प्रयजति – मै.सं. 3.9.8

रेतःसिच्यं वै प्रयाजाः – कौ.ब्रा. 10.3

वसवः प्रयाजेषु – काठ.सं. 34.16

संवत्सरं वा एते परीज्यन्ते यत् प्रयाजाः – कपि.क.सं. 8.4

अन्नं वै प्रयाजाः – काठ.सं. 9.1

आत्मा वै प्रयाजाः, प्रयाजा नुयाजाः – मै.सं. 3.7.2, काठ.सं. 23.9

ऋतवो वै प्रयाजाः – तै.सं. 1.6.11.5, मै.सं. 1.4.12, 1.7.3, कौ.ब्रा. 3.4

ते देवाः प्रयाजैरेभ्यो लोकेभ्यो असुरान् प्राणुदन्त – तै.सं. 2.6.1.3

पिता वै प्रयाजाः – तै.सं. 2.6.1.6

 

ऋतवो वै प्रयाजानुयाजाः  - कौ.ब्रा. 1.4,